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भारत में फैला जेन- जी का शब्दजाल अमेरिकी पिच पर खेल रहे संघ और सरकार

भारत में फैला जेन- जी का शब्दजाल
अमेरिकी पिच पर खेल रहे संघ और सरकार

— अनिल विभाकर

अमेरिका में गढ़ी गई नई शब्दावली ‘जेन- जी’ का जाल भारत में बुरी तरह फैल गया है । यह  शब्दावली केवल शब्दावली नहीं बल्कि अमेरिकी डीप स्टेट का एक नया नैरेटिव है जिसने केन्द्र की मोदी सरकार के सामने नई मुश्किल खड़ी कर दी है । इसका यहां इतना गहरा असर हुआ है कि आरएसएस  प्रमुख भी अब अपनी शब्दावली छोड़ जेन -जी जेन -जी कर रहे ।  ‘जेन- जी’ का यह शब्दजाल अत्यंत विभाजनकारी है। इस शब्दावली ने युवावर्ग की समग्रता समाप्त कर दी ।  युवा दो वर्गों में  बंट गये। ‘जेन- जी’ की परिभाषा के अनुसार 1997 से लेकर 2012 तक जन्मी युवा पीढ़ी  जेन – जी है  और  1997 से पहले पैदा हुए लोग जेन- जी से अलग माने जायेंगे। जेन – जी के साथ – साथ एक और नई शब्दावली चल पड़ी वह है जेन- अल्फा। 14 वर्ष से नीचे आयु वर्ग की पीढ़ी को जेन- अल्फा कहा जाता  है। अमेरिकी थिंक टैंक और डीप स्टेट ने इस नये नैरेटिव से जो पिच तैयार की उस पर केन्द्र की मोदी सरकार भी खेलती नजर आ रही है और संघ भी। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि संघ यानी आर एस एस भी इस शब्दजाल में आसानी से फंस गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब  ‘जेन – जी’ को  फ्रेंड्स कह कर सम्बोधित करते हैं । आर एस एस भी अब इसमें पीछे नहीं है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने  हाल ही में मुंबई के अपने एक कार्यक्रम में ‘जेन – जी’ पर खूब प्यार उड़ेला। जेन- जी और जेन- अल्फा की सराहना करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि यह नई पीढ़ी वर्तमान युवा पीढ़ी से ज्यादा ईमानदार है| मोहन भागवत यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा युवाओं के प्रदर्शन को देश विरोधी नहीं मानना चाहिए। वे अपने ही लोग हैं।

ताजा खबर यह है कि जंतर-मंतर सीजन-2 शीघ्र शुरू होने वाला है। ‘जेन- जी आंदोलन ‘ करने वाले कोकरोचों के स्वयंभु नेता अभिजीत दीपके ने ‘ जंतर-मंतर सीजन – 2 ‘ शीघ्र शुरू करने का एलान किया है। जंतर-मंतर से शुरू कोकरोचों का आंदोलन समाप्त होने के तुरंत बाद मैंने अपने एक लेख में कहा था कि ‘जेन – जी आंदोलन’  हमेशा के लिए खत्म हो गया यह मानना सरकार की बड़ी भूल होगी। नीट पेपर लीक तो सिर्फ बहाना था।  कोकरोच जनता पार्टी ने जंतर- मंतर पर जिस उद्देश्य से यह आंदोलन शुरू किया वह अभी पूरा नहीं हुआ है। दीपके और उसकी मंडली का मुख्य उद्देश्य तो देश में अराजकता, हिंसा और उपद्रव कराकर भारत को बंगलादेश और नेपाल बनाना है। उनका यह उद्देश्य अभी पूरा नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोकरोचों के जंतर-मंतर आंदोलन में स्वयं हस्तक्षेप कर उनकी इस मंशा पर पानी फेर दिया। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा हो गया और केन्द्र सरकार ने आंदोलन कारियों की अन्य सभी मांगें भी मान लीं जिससे  कोकरोच नेताओं को आंदोलन खत्म करने पर मजबूर होना पड़ा।

दरअसल कोकरोच जनता पार्टी को छात्रों और जेन- जी से कोई लेना-देना है नहीं। वह तो जेन- जी का इस्तेमाल कर देश को अराजकता की आग में झोकना चाहता है। झारखंड की राजधानी रांची में  जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में धांधली के विरोध में छात्र लगभग महीने भर अनशन और शांतिपूर्ण धरना – प्रदर्शन करते रहे मगर जेन- जी के इन स्वयंभु नेताओं ने इस ओर झांकने की जरूरत तक नहीं समझी। केरल , पंजाब और कर्नाटक में भी पेपर लीक के विरोध में युवा आंदोलन करते रहे, दीपके और उसकी मित्र मंडली इनमें से किसी राज्य में नहीं गई । इस सम्बंध में मीडिया के सवालों से दीपके सहित सभी कोकरोच नेता लगातार पल्ला झाड़ते नजर आये। इसकी वजह यह है कि इन राज्यों में जिन गैर भाजपा दलों की सरकारें हैं वे दल जंतर-मंतर पर सीजेपी के आंदोलन में  संसद से लेकर सड़क तक शामिल थे। इससे स्पष्ट है कि कोकरोच जनता पार्टी के नेता दीपके को जेन- जी और छात्रों की समस्या से कोई मतलब नहीं। उसे तो सिर्फ किसी न किसी बहाने केन्द्र की मोदी सरकार को अपदस्थ करना है।

झारखंड की राजधानी रांची में छात्रों के शांतिपूर्ण धरना – प्रदर्शन पर 10 अगस्त को पुलिस ने जिस तरह  सख्त कार्रवाई की , हेमंत सरकार की पुलिस ने कंटीले तार से घेराबंदी कर निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर जिस तरह लाठीचार्ज किया और आंसू गैस छोड़ी यह पूरे देश ने देखा।  संसद में घुसने की कोशिश कर रहे हिंसक प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली में सुरक्षा बलों ने जैसी कार्रवाई की, रांची में  पुलिस कार्रवाई उससे भी सख्त थी। दिल्ली में प्रदर्शन रोकने के लिए कंटीले तार की घेराबंदी नहीं की गई थी मगर रांची में तो कंटीले तार से घेराबंदी कर शांतिपूर्ण छात्रों और प्रदर्शन करने वालों को बेरहमी से पीटा गया।  रांची पुलिस ने अब तक छह सौ प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज किया है जिनमें सौ छात्रों पर तो नामजद एफआईआर है। हद तो यह हुई कि इस आंदोलन के समर्थन में महीने भर से अनशन कर रहे देवेन्द्र नाथ महतो को कांग्रेस के समर्थन से चल रही झामुमो सरकार ने सदर अस्पताल के आईसीयू में न सिर्फ कैद कर दिया बल्कि उनकी  पिटाई भी की। देवेन्द्र महतो  स्वतंत्रता दिवस पर 15 अगस्त को हाथ में तिरंगा ले अस्पताल से तिरंगा रैली में शामिल होना चाहते थे। उन्होंने अस्पताल से बाहर जाने की कोशिश की तो पुलिस ने  बाहर जाने से रोक दिया और अस्पताल के आईसीयू में ही  लात-घूंसों और लाठी से उनकी पिटाई की। सरकार और पुलिस का यह कृत्य तो दमनात्मक कार्रवाई की पराकाष्ठा है। ऐसी दमनात्मक कार्रवाई जंतर-मंतर के हिंसक जेन- जी आंदोलनकारियों पर भी नहीं की गई। अब भी झारखंड से आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज की लगातार खबरें आ रही हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन  और राहुल गांधी का पुतला तक उन्हें फूंकने नहीं दिया जा रहा। आश्चर्य यह कि दीपके और उसके समर्थन में खड़ी पार्टियां इस पर चुप हैं। मीडिया ने इस सम्बंध में जब उनसे सवाल किया तो  वे तरह – तरह के कुतर्क दे  हेमंत सोरेन सरकार के बचाव में उतर आये । कोकरोच जनता पार्टी और  भाजपा विरोधी दलों का यह दोहरा चरित्र बताता है कि जेन – जी तो सिर्फ इनका बहाना है , निशाना तो केन्द्र की मोदी सरकार और भाजपा है। इनका असली मकसद तो देश को अराजकता की आग में झोंक कर भारत को बंगलादेश और नेपाल बनाना है। झारखंड में आंदोलन कर रहे छात्रों की मांगें मानकर मुख्यमंत्री सोरेन ने अनशन और आंदोलन समाप्त करा दिया मगर इससे आंदोलनकारियों को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। छात्रों का कहना है कि सरकार ने उन्हें धोखा दिया। हुआ यह कि हेमंत सोरेन सरकार ने आंदोलनकारियों की मांगें मानकर जेपीएससी और जेएसएससी की सभी परीक्षाएं रद्द कर दीं जिससे सैकड़ों लोगों की नौकरी रातोंरात चली गई। जिनकी नौकरी गई वे इस निर्णय के विरोध में सड़क पर उतर आए। इस निर्णय को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी गई तो हाईकोर्ट ने इस पर तुरंत रोक लगाते हुए उन लोगों की सेवा बहाल कर दी और उन्हें तुरंत अपने – अपने पदों पर ज्वॉइन करने का आदेश दे दिया। महीनों से आंदोलनरत छात्रों का कहना है कि हेमंत सरकार ने हाईकोर्ट में जान बूझकर कर अपने निर्णय के पक्ष में पैरवी नहीं की इसलिए सरकार के इस फैसले पर मामले की सुनवाई कर रहे जजों ने राज्य सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी। अब यह पूरा मामला अदालती पचड़े में उलझ गया है जिससे क्रुद्ध छात्र फिर से आंदोलन करने को मजबूर हैं।

नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरुद्ध कोकरोच जनता पार्टी के बैनर तले धरना- प्रदर्शन और इसकी सफलता के बाद वैश्विक स्तर पर ‘जेन – जी ‘ की खूब चर्चा हो रही है। कुछ लोगों को लगता है कि ‘ जेन – जी ‘ ही अब वह विकल्प है जो देश में भ्रष्ट सरकार को उखाड़ कर जनहितकारी सरकार कायम कर सकता है।  झारखंड की राजधानी रांची, पंजाब और कर्नाटक में पेपर लीक पर कोकरोच जनता पार्टी की अनदेखी से अभिजित दीपके और कोकरोच नेताओं के चेहरे पर चढ़ी कलई बहुत जल्द उतर गई। ताज्जुब है इसके बाद भी कुछ लोगों को जेन जी के इन स्वयंभु नेताओं से बहुत उम्मीदें हैं।

अब सवाल है यह ‘जेन – जी’ आखिर ऐसी कौन- सी शक्ति है जो अचानक  प्रकट हो गई जिसने कुछ लोगों के मन में सकारात्मक उम्मीदें जगा दीं ? ‘जेन – जी ‘ शब्दावली लगभग चार साल पहले अमेरिका में गढ़ी गई जिसका एक खास राजनीतिक मकसद है। इस शब्दावली के अनुसार  वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा  ‘जेन – जी ‘  हैं।  इस आयु वर्ग के लोगों के लिए यह एक नई शब्दावली है।  फटी जीन्स पहन कर कुछ लोगों को जिस तरह विशिष्टता का बोध होता है, युवाओं का यह वर्ग ‘जेन – जी’  की संज्ञा पाकर उसी तरह अचानक विशिष्टता बोध से भर उठा है। फटी जीन्स पहनने वालों को भारतीय समाज का बहुत बड़ा वर्ग अच्छी दृष्टि से नहीं देखता फिर भी पाश्चात्य देशों से आया यह फैशन भारत में चल पड़ा है। ठीक इसी तरह 1997 से 2012 तक जन्मे युवा अपने को ‘जेन – जी’  कहलाने में सुखद वैशिष्ट्य बोध का अनुभव करते हैं। सवाल है अमेरिका को आखिर ‘ जेन- जी ‘ शब्द गढ़ने की जरूरत क्यों महसूस हुई ? और इसके पीछे उसका क्या मकसद है ? गंभीरता से चिंतन करें तो  इसके पीछे उसकी एक खतरनाक योजना दिखाई देगी , जो चिंतित करने वाली है। दरअसल अमेरिका  ‘जेन – जी ‘ का इस्तेमाल कर दुनिया के उन देशों को अस्थिर और विखंडित कर वहां अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है जो उसके इशारे पर नर्तन नहीं करते। ‘जेन – जी ‘ आंदोलन का पहला प्रयोग अमेरिका ने 2024 में  बंगलादेश में किया। कहने की जरूरत नहीं कि ‘जेन – जी ‘ आन्दोलन के नाम पर बंगलादेश में किस तरह उत्पात और रक्तपात हुए, शेख हसीना सरकार का तख्तापलट करने के लिए किस तरह आगजनी और मारकाट हुई। अल्पसंख्यक हिंदुओं पर वहां कैसे – कैसे जुल्म ढाये गये। ‘जेन जी’  ने वहां न सिर्फ प्रधानमंत्री शेख हसीना सरकार का तख्तापलट किया बल्कि उनकी हत्या की ऐसी कोशिश की कि जान बचाकर आनन-  फानन उन्हें अपने देश से भागना पड़ा। हसीना आज भी भारत की शरण में हैं। विश्व में ‘जेन- जी ‘ का दूसरा आंदोलन 2025 में नेपाल में हुआ। नेपाल में तो वर्षों से चीन समर्थक सरकारें रहीं। 2025 में भी वहां जो सरकार थी वह चीन समर्थक ही थी। ‘जेन – जी’ आंदोलन के नाम पर पूरे नेपाल में जैसी हिंसा, आगजनी और उपद्रव हुए वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं। विशिष्टता बोध से भरे ‘जेन -जी’ ने पूरे नेपाल को एक तरह से तहस-नहस कर दिया। प्रधानमंत्री से लेकर कई मंत्रियों की घर में घुसकर कर पिटाई, हत्या और लूटपाट की। कुछ सत्ताधारियों को तो भूमिगत होकर जान बचानी पड़ी। इस तरह वहां भी ‘जेन जी’ की  अराजकता की पराकाष्ठा विश्वभर ने देखी। बंगलादेश की तरह नेपाल में भी कुछ महीने बाद चुनाव हुए और वहां नई सरकार बनी। ‘जेन जी’ आंदोलन के बाद बंगलादेश में अब तक स्थिति सामान्य नहीं हुई है। और नेपाल की नई बालेन्द्र शाह सरकार से भी वहां की आम जनता खुश नहीं है। नेपाल एक बार फिर से जल उठा है। वहां नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग भी उठने लगी है।  इस समय वहां मुसलमानों पर राह चलते हमले हो रहे हैं। बहुसंख्यकों की उग्र भीड़ मस्जिदों पर लगातार हमले कर रही है और मुसलमानों को नेपाल छोड़ अन्यत्र जाने का अल्टिमेटम दिया जा रहा है। बंगलादेश में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद अमेरिका से आकर मोहम्मद यूनुस सत्ता पर काबिज हुआ तो वहां हिंसा और उत्पात और बढ़ गया। यूनुस डेढ़ साल तक सत्ता में रहा। वहां  नये सिरे से चुनाव हुए और नई सरकार बनी। वहां जो सरकार बनी, इस समय वह अमेरिका के इशारे पर काम कर रही है। ‘जेन जी’ आंदोलन से पहले नेपाल में चीन समर्थक सरकार थी और बंगलादेश में भारत समर्थक। दोनों देशों में इस समय भारत विरोधी और अमेरिका परस्त सरकार है। इस तरह नेपाल और बांग्लादेश में ‘जेन जी’ आंदोलन का अमेरिकी  मकसद पूरा हो गया।

‘जेन – जी’ का तीसरा प्रायोगिक आंदोलन  इस वर्ष जुलाई में ‘ कोकरोच जनता पार्टी ‘ के बैनर तले भारत में हुआ। नई दिल्ली में जंतर मंतर से शुरू इस ‘जेन जी आंदोलन’  में भी जमकर हिंसा और उपद्रव हुए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर 20 जुलाई को जंतर-मंतर से लेकर संसद के समीप तक जैसी अराजकता दिखी उसका समर्थन कोई नहीं कर सकता।’ जेन जी ‘ की यह उग्र भीड़ यदि संसद में घुसने में सफल हो जाती तो उस दिन अनर्थ हो जाता। कहने की जरूरत नहीं कि नीट पेपर लीक की आड़ में दिल्ली में ‘ जेन जी’ ने कैसी  अराजकता फैलाई। यह भी गौर करने की बात  है कि राजधानी नई दिल्ली में  काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का संस्थापक अभिजित दीपके भी मोहम्मद यूनुस की तरह उड़कर अमेरिका से नई दिल्ली आया। दीपके जब दिल्ली पहुंचा तो हवाई अड्डे पर उसकी अगवानी करने गिनती भर ही लोग पहुंचे। जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक ने पहुंचकर समर्थन में अनशन शुरू किया तब भी वहां अपेक्षित भीड़ नहीं जुटी। इसके बाद भी बात बनती न देख इस आंदोलन के पीछे छिपे सारे चेहरे एक- एक कर सामने आने लगे। अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण, अरुंधती राय, योगेन्द्र यादव, राकेश टिकैत, पवन खेड़ा, जेएनयू के वामपंथी छात्र से लेकर वामपंथी दलों  और कांग्रेस से जुड़े संगठनों के नेताओं – कार्यकर्ताओं का पहुंचना वहां शुरू हो गया । आतंकवाद निरोधक कानून के तहत  जेल में वर्षों से बंद शर्जील इमाम और उमर खालिद के समर्थन में वहां नारे गूंजने लगे।’ दिमागी नक्सली ‘ जंतर-मंतर पर पूरी तरह सक्रिय हो गये। वहां प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ भद्दी – भद्दी गालियों की बौछार होने लगी। जेन -जी आंदोलनकारियों ने जम्मू – कश्मीर में धारा 370 और 35 ए की वापसी की मांग शुरू कर दी और  अश्लीलता की हदें पार करते हुए ‘ मेरा लिंग मेरी मर्जी ‘ का नारा तक लगाने लगे। इन आंदोलनकारियों के बीच जंतर-मंतर पर कुछ अमेरिकी और अन्य देशों के संदिग्ध नागरिक भी देखे गए । शुक्र है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्थिति की गंभीरता भांप इसमें सीधे हस्तक्षेप किया और स्थिति भयावह होने से बचा लिया।

यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘जेन जी’ के नाम पर दुनिया में अबतक जो भी आंदोलन हुए उसके पीछे अमेरिका और उसके डीप स्टेट का हाथ है। भारत को खंडित और अस्थिर करने पर आमादा है अमेरिका। इसलिए उसने ‘जेन जी ‘ का इस्तेमाल कर बंगलादेश में भारत समर्थक शेख हसीना सरकार का तख्तापलट कराया। भारत के पड़ोसी नेपाल में तख्तापलट और उपद्रव के पीछे भी ‘जेन जी’ और अमेरिका ही थे अमेरिका का मकसद नेपाल को चीन के प्रभाव से मुक्त कर अमेरिका समर्थक भारत विरोधी सरकार बनाना था जिसमें वह सफल रहा। बंगलादेश में भी उसका मकसद भारत समर्थक शेख हसीना सरकार को अपदस्थ कर अमेरिका समर्थक सरकार बनाना  था और भारत में भी नीट पेपर लीक की आड़ में इस कथित ‘जेन जी’ आंदोलन में नि:संदेह अमेरिका का ही हाथ है।

नरेंद्र मोदी सरकार अमेरिका को फूटी आंख नहीं सुहा रही। इस सरकार को अपदस्थ करने के लिए वह अरबों डालर खर्च कर रहा है| भारत में सौ से ज्यादा ऐसे एनजीओ हैं जिन्हें अमेरिका से बड़ी मात्रा में वित्तीय मदद मिलती है। दर्जनों एनजीओ और अन्य देशविरोधी शक्तियों पर जार्ज सोरोस अरबों डॉलर खर्च कर रहा है सो अलग। जंतर-मंतर पर कोकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में वे सभी एनजीओ चलाने वाले सक्रियता से शामिल थे जिन्हें विदेशों से वित्तीय पोषण मिल रहा है ।  ‘जेन जी ‘ और कोकरोचों के आंदोलन में शामिल लोगों के लिए जंतर-मंतर पर जोमैटो और अन्य फूड डिलिवरी ऐप से विदेशों से मुफ्त में पिज्जा, बर्गर और तरह – तरह के स्वादिष्ट व्यंजन आ रहे थे। बंगलादेश, नेपाल और भारत में ‘जेन जी’ के  आंदोलनों में एक बात सामान्य थी वह थी अराजकता । तीनों आंदोलनों में अराजकता ही अराजकता देखने को मिली। इसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि ‘जेन जी ‘ अराजक युवकों का वह वर्ग है जिसे अमेरिका अपने हित के लिए संचालित कर रहा है और यदि प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में कहें तो इन अराजक युवकों को ‘दिमागी नक्सलियों’ का सक्रिय समर्थन है।

यह सही है कि नीट पेपर लीक एक बहुत गंभीर मुद्दा है। सरकार को शिक्षा और परीक्षा प्रणाली पारदर्शी और दुरुस्त करनी ही चाहिए मगर यह समस्या केवल बारह वर्ष में उत्पन्न हुई यह कहना भी सही नहीं होगा। इससे पहले की गैर भाजपा सरकारों में भी पेपर लीक होते रहे हैं जिसके विरोध में  ‘जेन जी’ और छात्रों ने सड़कों पर उतर कभी इस तरह उत्पात नहीं मचाया। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे से जेन- जी के नेताओं का उत्साह कुलांचे मार रहा है। काकरोच जनता पार्टी के नेता अब सुप्रीम कोर्ट तक को निशाने पर लेने लगे हैं। उनका कहना है कि जब सब कुछ सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा तो अब सुप्रीम कोर्ट के विरोध में ही प्रदर्शन किया जायेगा। दीपके और उसके साथी अब सुप्रीम कोर्ट का आदेश – निर्देश भी नहीं मान रहे। इसके नेता एक तरफ तो यह कहते हैं कि प्रदर्शन में हिंसा करने वाले भाजपा और आरएसएस के गुंडे थे। मगर इन गुंडों पर  कार्रवाई का सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने से काकरोच नेताओं ने न सिर्फ  इनकार दिया बल्कि इसके विरोध में फिर से सड़क पर उतरने की  धमकी भी दे रहे हैं। काकरोच नेता आखिर भाजपा – आर एस एस के गुंडों को क्यों बचाना चाहते हैं ? दरअसल काकरोच नेता देश की हर संवैधानिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करना चाहते हैं।  कोकरोच जनता पार्टी ने इसीलिए जंतर-मंतर सीजन – 2 शीघ्र शुरू करने का एलान किया है। ‘जेन- जी’ आंदोलन का असली राजनीतिक मकसद अब उजागर हो गया है। यह उजागर हो गया कि उनके लिए नीट पेपर लीक और छात्र हित सिर्फ बहाना है। निशाना तो कुछ और है।  जेन – जी आंदोलन को भारत विरोधी अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों का भरपूर समर्थन है इसके सबूत भी सामने आ चुके हैं। सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को कैसे भड़काया इसकी सच्चाई सामने आ गई। इसके लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक – ट्विटर चलाने वाले मेटा के मालिक एलेन मस्क को भारत सरकार से माफी मांगनी पड़ी। मेटा के मालिक एलेन मस्क ने यह माना कि पैसे लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर  बढ़ा चढ़ा कर झूठी खबरें फैलाई और जेन- जी आंदोलन को भड़काया । याद रहे कि मस्क ने प्रधानमंत्री मोदी का वीडियो संदेश पूरे पांच घंटे तक रोकने की हिमाकत तक की। जो विपक्षी दल काकरोच जनता पार्टी को समर्थन देने सामने आये , जनता में उनकी विश्वसनीयता नहीं है। इसलिए उन्हें लगातार चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा रहा है।

चुनाव पूर्व इस तरह के आंदोलन चुनावी लाभ के लिए किये जाते हैं| डेढ़ साल तक देश में चला किसान आंदोलन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को सत्तारूढ़ करने के लिए हुआ था न कि किसानों के हित के लिए । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की हार के बाद योगेन्द्र यादव ने खुद एनडीटीवी से एक इंटरव्यू में यह कहा था कि ‘अखिलेश जी के लिए तो हमने अच्छी तरह पिच तैयार कर दी थी मगर उसपर वे अच्छी बैटिंग नहीं कर सके तो मैं और क्या कर सकता था।’ अगले साल उत्तर प्रदेश सहित देश की सात विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। लगता है देश में यह जेन – जी आंदोलन भी इसीलिए शुरू किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विपक्षी दलों को इस आंदोलन से पुनर्जीवन मिला है। किसान आंदोलन की तरह ही योगेन्द्र यादव समेत सभी आंदोलनजीवी इसमें उसी तरह सक्रिय हैं। दिक्कत यह है कि विपक्षी दल चुनावों में अपनी हार की ईमानदारी से समीक्षा नहीं करते और मोदी सरकार का विरोध करते – करते देश का विरोध करने लगते हैं। इसलिए उनका जनाधार हमेशा खिसक रहा है। सरकार का विरोध करने में कोई हर्ज नहीं । मगर देश का विरोध कहीं से उचित नहीं। अच्छी बात यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने तत्परता दिखाते हुए पेपर लीक रोकने के लिए कड़ा कानून बना भी दिया। एक बात और । भारत तो बंगलादेश और नेपाल बनने से रहा । भाजपा नीत केंद्र की एनडीए सरकार को विपक्षी दल यदि अपदस्थ करना चाहते हैं तो चुनाव में उसे हराकर ऐसा सकते हैं। इसके लिए विपक्षी दलों को आत्मविश्लेषण और ईमानदारी से चिंतन करना होगा। जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता कायम करनी होगी उन्हें तभी यह संभव है।

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