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इंद्रधनुष

हिंदी साहित्य

15 जुलाई 2026

पठन समय: 5 मिनट
शिवदयाल
हिंदी साहित्य एवं चिंतन

सूरज की किरणें वर्षा की बूँदों पर पड़ती हैं और सात रंगों में विभक्त होकर क्षितिज पर उत्तर से दक्खिन दिशा में धनुष के रूप में तन जाती हैं। इन्द्रधनुष है तो इसका मतलब है कि कहीं जल है, तृप्ति है, कि पिपासा और तृष्णा का अंत होने वाला है। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं, अम्बर से अमृत-बूँदें बरसने ही को हैं। फिर तो वर्षा-जल से आप्यायित धरती पर सृजन का कारोबार शुरू ही हो जाएगा। हमारे यहाँ श्रमण और साधु जो कभी नहीं रुकते-ठहरते – रमता जोगी बहता पानी – बरसात के चार महीने एक जगह ठहरकर ‘चातुर्मास’ बिताते हैं। सिर्फ अपनी सुविधा के लिए नहीं बल्कि इसलिए भी कि उनकी गतिविधियाँ इस ‘सृजन-उत्सव’ में कहीं से भी बाधक न बनें। प्रकृति और प्रतिवेश के प्रति इस एकात्मता-बोध् से चलकर आज हम यह कहाँ आ पहुँचे हैं कि ‘पर्यावरण दिवस’ और ‘पृथ्वी दिवस’ के नाम पर खुद को ही बचाने की गुहार लगा रहे हैं।

इन्द्रधनुष देख मन उमगता है। मानो अंतर के सारे रंग छलककर क्षितिज पर टँग जाते हैं – सतरंगे धनुष की शक्ल में। इन्द्रधनुष जैसे दिलासा देता है कि बदरंगी में भी रंग है। यों तो जमाना रंगों का है, वह भी चटख रंगों का। सादा और उदास रंगों का जमाना गया। अंतर का रंग फीका पड़ता गया और बाहर चटख रंग फैलते गए। बाहर रंग ही रंग दिखाई देते हैं और वास्तव में हम सभी किसी न किसी प्रकार रंगों के व्यापार में ही रमे हैं। कोई लाल रंग का व्यापार कर रहा है तो कोई हरे रंग का। कोई नीले रंग का तो कोई केसरिया रंग का। जब व्यापार है तो प्रतिस्पर्धा भी है। और तब आग्रह-दुराग्रह भी हैं, और इसमें हर रंग फीका पड़ रहा है, अपनी पहचान खो रहा है।

चाहे-अनचाहे हम किसी न किसी रंग के प्रति आसक्त हैं, शायद प्रतिबद्ध भी। हम उस खास रंग से पहचान पाते हैं, बल्कि स्वयं हमारा भी कोई न कोई रंग है, भले ही वह हमें पसंद न हो। जैसे हम खुद काले हों और गोरा रंग हमें पसंद हो, कालों को गोरा बनाने वाली क्रीमों से बाजार पट गए हैं। इसके विपरीत अगर हमें हरा या लाल ही सही, रंग पसंद हो तो हर कहीं उसे ही देखना चाहते है, हर चीज को उसी रंग में डुबो देना चाहते हैं। कभी-कभी हमारा आग्रह इस हद तक पहुँच जाता है कि हमें कहीं कोई और रंग दीख ही नहीं पड़ता। वैसे आँखों की एक बीमारी में कोई-कोई रंग कोई और ही रंग प्रतीत होता है, जैसे देख रहे हों लाल और दीख रहा हो केसरिया। इसे रंग-अंधता या वर्ण-अंधता कहते हैं। राजनीति में यों तो यह बीमारी आम है, लेकिन यह राजनीति का चमत्कार ही है कि कभी-कभी यही सच होता है, यानी तौर-तरीके इतने एक-से होते हैं कि रंग का भेद करना मुश्किल हो जाता है। शायद इसलिए कि सत्ता का अपना ही एक रंग होता है, उस पर कोई और रंग नहीं चढ़ता – क्या लाल, क्या हरा और क्या केसरिया।

“यह उत्तर से दक्खिन तक क्षितिज पर तनी सतरंगी धन्वाकार रेखा ‘नार्थ-साउथ’ का कोई भेद नहीं मानती, बल्कि उन्हें परस्पर जोड़ती है।”

हमारी रंग-संवेदना हमारी दुनिया को बनाती और बिगाड़ती है। देखें तो दुनिया रंग-संवेदना का ही कारोबार है। कवि-कलाकार से लेकर राजनेता, और धर्म के पहरूए तक इसी कारोबार में रमे हैं। अलग-अलग रंग और अलग-अलग दुकानें। सभी रंगों में अपनी पहचान ढूँढ रहे हैं, सभी रंगों से पहचाने जा रहे है। सभी रंगों की कमाई कर रहे हैं। हमारे यहाँ ‘रंग जमाने’ की कोशिशें होती हैं, ‘रंगदार’ होते हैं जो मुहल्लों-टोलों में रंगदारी टैक्स वसूलते हैं। यह उत्तर से दक्खिन तक क्षितिज पर तनी सतरंगी धन्वाकार रेखा ‘नार्थ-साउथ’ का कोई भेद नहीं मानती, बल्कि उन्हें परस्पर जोड़ती है। सबके मन के आकाश में तनता है इंद्रधनुष, चाहे वह कितना ही सूना हो, कितना ही फीका हो, या एकाकी! लेकिन इंद्रधनुष है तो उसमें सात रंग हैं। वह छह, पाँच या कम, बल्कि आठ रंगों का भी नहीं हो सकता। कोई गूढ़ बात है, रहस्य जीवन का। इंद्रधनुष के सात रंग, जैसे सात सुर, जैसे सात समुद्र, जैसे सात जन्म…! सात घोड़े सूरज के! सप्ताह के दिन भी सात ही।

हमारा लोक-मन भी कितना रंगीला है। वह रंगों का उत्सव-पर्व मनाता है। कृष्ण की रास-लीला भी तो रंग-लीला ही है। वह गोपियों के संग रास ही नहीं रचाते, होली भी खेलते हैं। गुरु-दर्शन से आह्लादित हजरत अमीर खुसरो कह उठते हैं – आज रंग है! राजस्थान की मरूभूमि पर भी चुनरियों के छींटदार रंग छिटके पड़े हैं। वास्तव में हमारे लोक जीवन में ही रंगों को देखने की एक ‘दृष्टि’ है। इसमें किसी एक रंग के प्रति आग्रह नहीं दिखता, बल्कि मन अपने ‘इष्ट’ के रंग में ही रंग जाना चाहता है और यह जीवन की चरम उपलब्धि है। वह ‘इष्ट’ चाहे फिर देवता हो या मनुष्य। वहाँ हर रंग अलग-अलग कारणों से अलग-अलग संदर्भों में समादृत है। क्योंकि यह दुनिया एक रंग की नहीं बनी, नहीं बनाई जा सकती। यह दुनिया रंग-बिरंगी है और बनी रहेगी। हर रंग दूसरे रंग के होने से ही पहचान पाता है, अर्थ पाता है। रंगों की कैसी विस्तीर्ण और अद्भुत छटा बन सकती है, इसका प्रमाण स्वयं हमारा भारतीय समाज है।

इंद्रधनुष अपने आप में एक मूल्य है। यह चातक की पिपासा को स्वाति की बूँद का आश्वासन है। इंद्रधनुष में सृजन के रंग समाहित हैं। इसके सात रंग परस्पर मिलकर असंख्य रंग-वर्णों की सृष्टि करते है, जबकि सात रंग वास्तव में निखरी हुई उजली धूप के सात टुकड़े हैं। इंद्रधनुष धूप के टुकड़ों से ही तो बनता है। सातों रंग मिलकर धूप बन जाते हैं जिसकी ऊष्मा और आँच से जगत का कार्य-व्यापार चल रहा है, जिसके आलोक से हमारी दुनिया प्रभासित हो रही है।

इंद्रधनुष सृष्टि की बाहों का घेरा है – व्यष्टि से लेकर समष्टि तक को अपने में समेट लेने को आतुर!

लेखक परिचय

शिवदयाल
sheodayallekhan@gmail.com
9835263930

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