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हम संवेदनहीन क्यों बनते जा रहे हैं

हम संवेदनहीन क्यों बनते जा रहे हैं

सृष्टि में, जीवन में एक शाश्वत विरह है। हम सभी एक ही तत्व से उद्भूत हो अलग-अलग अस्तित्व बने मानो पुनः एक होने की आकुलप्रतीक्षा में है, जैसे ग्रह-नक्षत्र, आकाशगंगाएं पृथक होकर भी एक-दूसरे के चक्कर काट रहे हैं, परिक्रमा कर रहे हैं क्योंकि उनका मूल एक ही है। आधुनिक मनुष्य इस विरह को, इस मूल वेदना को नहीं समझ पा रहा है। उसने सुख और भोग की लालसा और लब्धि के लिए अपने लिए ऐसी व्यवस्थाएं निर्मित कर ली हैं जिनमें उसने वेदना और दु:ख के कृत्रिम स्रोत और साधन विकसित कर लिए हैं। वह अपने ही विनिर्मित दुःखों से घिरा है और उनसे छुटकारा पाने की कोशिश में और अकेला पड़ता जा रहा है। उसे अपना ही दु:ख सबसे बड़ा लगता है। वह अपने विस्तारित अस्तित्व के विषय में न सोच पा रहा है, न देख पा रहा है। अपने से बाहर आकर वह आक्रामक बन रहा है, और इसके उल्टे अपने में सिमट कर आत्महंता। संवेदनहीनता वहां है जहां से दूसरे को देखने, जानने, समझने की जिज्ञासा ही न हो, और उससे जुड़ने की कोई अनिवार्यता या दबाव अपने अंदर अनुभव ही न हो।

हम एक हिंसक और नृशंस समय में जी रहे हैं तो इसका मूल कारण यही है कि हमारे सामने जो पूरी विश्व व्यवस्था है वह संवेदनशील मनुष्यों का समाज नहीं चाहती। कहने को यह मानव सभ्यता के उत्कर्ष का दौर है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अकल्पनी उपलब्धियां अर्जित की गई हैं। एक ही साथ विकास और विनाश के अपरिमित साधन विकसित किए गए हैं। किसी भी व्यक्ति, समाज या देश की भौतिक उपलब्धियां ही उसकी उन्नति का संकेतक बन गई हैं। पूंजी, चाहे वह जिस साधन से भी अर्जित की गई हो, हमारे जीवन का लक्ष्य बन गई है। पूंजी भी असीमित क्योंकि उपभोग की लालसा की भी कोई सीमा नहीं है। भोगवादी पूंजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य मात्र के लिए अच्छा, सार्थक जीवन जीने का पैमाना बदल दिया है। हमारे शास्त्रों में परोपकार की जो महिमा बताई गई है उसमें आदमी के लिए देने और देते जाने का कर्तव्य और धर्म निर्धारित किया गया है, और इसे ही मनुष्य जीवन की उपलब्धि माना गया है। वास्तव में कहीं ना कहीं प्राकृतिक उपादान, जैसे वृक्ष, नदियां आदि हमारे जीवन मूल्यों के नियामक रहे हैं। शायद इसीलिए प्रकृति के प्रति एक साधारण व्यक्ति का भाव विनयशील ही रहा है। आज जैसी हिंसा धरती के प्रति हो रही है उसकी कल्पना सौ-डेढ़ सौ साल पहले कठिन थी, कम से कम भारतीय

समाज में। संवेदनहीनता और हिंस्र भाव ने समूची धरती को ही अपने घेरे में ले लिया है। यही कारण है कि आज धरती पर जीवन के अस्तित्व को ही खतरा उत्पन्न हो गया है। कठिनाई यह है कि खतरे से निपटने के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं वह फौरी और ऊपरी हैं। इसलिए उनकी सफलता संदिग्ध है। प्रश्न यह है कि वह जीवन दृष्टि कैसे बदली जाए जो हमें आज इस मुकाम पर ले आई है जहां हर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का प्रतियोगी है, सहयोगी नहीं। जहां मानवीय मूल्यों के ऊपर धन और तकनीक का प्रभुत्व इस सीमा तक बन गया है कि जैसे मनुष्य एक आर्थिक, यांत्रिक प्राणी मात्र बनकर रह गया हो। तकनीक द्वारा मानवीय उद्यम का विस्थापन हो रहा है। मानवीय श्रम की महिमा घट गई है। वह यंत्रों के मुकाबले दोयम दर्जे की चीज बनता जा रहा है। यह एक और प्रकार की दशा है अमानवीयकरण की। दूसरी ओर अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि अपने साथ अमानवीयकरण की स्थितियां ले आती है। त्रासदियों की आवृत्ति, उनका बार-बार घटना, बड़े पैमाने पर घटित होना त्रासदी के प्रति संवेदनहीन बना देता है। जैसे, पहले आबादी कम थी, रेलगाड़ियां कम थीं, रेल दुर्घटनाएं कभी-कभी घटती थीं और लोगों की स्मृति में रह जाती थीं। आज की स्थिति है – बढ़ी हुई आबादी, भारी संख्या में रेलें और आए दिन रेल दुर्घटनाएं। इसे लोग अब रोजमर्रा की बात मानने लग गए हैं और प्रायः चर्चा भी कम ही करते हैं। इस प्रकार मनुष्य के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के आधार सिमटते जा रहे हैं। अहिंसा, करुणा, दया जैसे मानवीय गुणों को आज का मनुष्य अपने ही अस्तित्व के लिए चुनौती मानने लगा है, मानो इनका पालन करने से उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। ऐसे में नैतिकता आज के जीवन में एक बोझ है जिसे ढोते हुए आप जीवन की दौड़ में पिछड़ जाएंगे। साहित्य, कला, धर्म-अध्यात्म – इन सबके मूल में संवेदना है। यहां तक कि मानव मुक्ति के लिए जो भी विचार आए या जो स्वप्न आज तक देखे गए, उनके मूल में भी संवेदना, परदु:खकातरता ही रही, यानी संवेदनशील मन ही रहा। आखिर अपने आदर्शों की खातिर लोग अपना उत्सर्ग कर देते हैं, बलिदान हो जाते हैं – यह संवेदना की ही पराकाष्ठा तो है। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में राजनीति विश्व स्तर पर अनेक बदलावों का माध्यम बनी और इनमें से ज्यादातर का लक्ष्य एक बेहतर और कहीं अधिक मानवीय दुनिया का निर्माण करना रहा। लेकिन इसी काल में राजनीति विभिन्न रूपों या संस्करणों के सर्वसत्तावाद का भी माध्यम बनी जिसके कारण भयानक संहार हुआ। दो-दो विश्व युद्ध दुनिया पर लादे गए, परमाणु बम का प्रयोग हुआ। इस स्तर की हिंसा के बाद भी दुनिया में, मनुष्य समाज में संवेदना बची रह गई तो इसका कारण यही है कि वास्तव में संवेदना और समानुभूति हमारे अस्तित्व की ही अपरिहार्यता है। जब हम दूसरों के कष्टभोग के प्रति संवेदित होंगे, उनके सहायक होंगे तभी अपने कष्टों में उनके साथ और सहयोग की अपेक्षा हम कर सकते हैं। पिछली सदी इस अर्थ में भी युगांतरकारी रही कि इस दौर में राजनीतिक क्रियाओं और अभियानों ने सामाजिक-आर्थिक नीतियों, यहां तक की विधानों को निर्बलों, बहिष्कृतों के पक्ष में सफलतापूर्वक बदला। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन ने केवल अंग्रेजी राज से मुक्ति नहीं दिलाई बल्कि साधारण भारतीय जन को वंचितों, महिलाओं, पददलितों और अस्पृश्यों के प्रति संवेदित किया, उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा। आज यह समूह हमारी हमारे संसदीय लोकतंत्र में बहुत ताकतवर है। ये सरकारें बना सकते हैं और गिरा सकते हैं। राजनीतिक दलों ने अपने हक में इन्हें वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया क्योंकि इनके वोट की ताकत सत्ता तक पहुंचा सकती है। अब प्रतिद्वंद्वी दलों के अलग-अलग वोट बैंक बन गए और उनके बीच प्रतिद्वंद्विता भी शुरू हो गई। यहां राजनीति की भूमिका समाज और व्यवस्था को बदलने या उसे बेहतर बनाने के लिए ही नहीं, बल्कि राजसत्ता प्राप्त करने के एकमात्र माध्यम के रूप में सीमित हो गई। राजनीति जोड़ने के लिए नहीं, तोड़ने के लिए प्रयुक्त होने लगी। इसका असर हमारी आपसदारी पर पड़ा और जमीनी स्तर पर वैमनस्य बढ़ा, सामाजिक जीवन विषाक्त बना। हमारी संवेदना भी मानो बंट गई। कोई घटना घटती है तो अपनी राजनीतिक सोच, सलंग्नता और पसंद के मुताबिक पीड़ित या प्रभावित व्यक्ति या समूह के प्रति हम अपनी संवेदना और सहानुभूति प्रदर्शित करते हैं। किसी दुर्घटना या त्रासदी के पश्चात राजनीतिक दलों की जैसी प्रतिक्रिया आती है, वह उनके अपने आग्रहों (और विवशताओं) के अनुरूप होती है। वह सहज मनुष्योचित प्रतिक्रिया प्रायः नहीं होती। इस कारण भी हमारी सामान्य संवेदनशीलता का ह्रास हुआ है। घटनाएं घटती हैं – वीभत्स से वीभत्स, लेकिन हम उस स्तर तक संवेदित नहीं होते जिस स्तर तक होना चाहिए। राजनीति, सच कहें तो शवों का भी बंटवारा कर देती है। आम आदमी की संवेदना नेपथ्य में रह जाती है। ऐसी स्थिति में राज्य की नागरिकों के प्रति कितनी संवेदना बचेगी?

लोकतांत्रिक देश में भी विरोध को कुचला जाता है। विरोध प्रदर्शनों में जो गिरे हुए हैं, घायल हैं – पुलिस उन पर भी लाठियां बरसाती है। संवेदनहीनता में झूठ और सच समतुल्य हो जाते हैं, फिर नीति और विवेक कहां तक बच पाएगा। संवेदनशून्यता इस प्रकार हमारे आम जनजीवन में घर कर जाती है। आप में संवेदना है भी तो शक्तिमत की लाठी आपको बोलने नहीं देगी।

दूसरी ओर राजनीति को जब हम विश्व स्तर पर देखते हैं तो बड़े, विकसित और सामर्थ्यशाली देशों के बीच एक स्थायी प्रतिद्वंद्विता चल रही है। यह यूरोप में राष्ट्र-राज्यों के अस्तित्व में आने के बाद से ही शुरू हो गया। इसका मूल उद्देश्य धरती के संसाधनों पर आधिपत्य जमाना रहा है। बीसवीं सदी में अमेरिका एक तरफ एक ताकतवर देश के रूप में उभरा, लगभग उसी समय रूसी क्रांति के बाद साम्यवादी सोवियत संघ अस्तित्व में आया। दूसरे महायुद्ध में पूंजीवादी और साम्यवादी साथ रहे लेकिन युद्ध के पश्चात दो ध्रुव बन गए – अमेरिका सहित पश्चिमी यूरोप के देश (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन नाटो) जो पूंजीवादी कल्याणकारी राज्य थे, तथा सोवियत संघ के साथ पूर्वी यूरोप के देश (वारसा संधि के अंतर्गत कम्युनिस्ट देश)। दुनिया में एक और किस्म का युद्ध शुरू हुआ – शीत युद्ध जो कि 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद ही समाप्त हुआ। आज की तारीख में लगता है कि भले ही कहने को वह शीत युद्ध का दौर रहा हो, वह भी अत्यंत हिंसक दौर रहा जिसमें दोनों और के अनेक देशों के लाखों लोग मारे गए। क्रांतियों के दौरान और उसके बाद भी अनेक समाजवादी देशों में और तटस्थ देशों में भी हजारों लोग हताहत हुए। कई देश विचारधारा के नाम पर बंट भी गए। वैसे इस शीत युद्ध की निरंतरता आज तक कायम है। ऊपर राख दिखती हो भले ही, नीचे अंगारे दबे पड़े थे जो रूस-यूक्रेन युद्ध में ज्वालामुखी के लावे की तरह बाहर उबल पड़े। वारसा संधि के देशों का भले एक संगठन के रूप में अस्तित्व बना नहीं रह गया हो, नाटो देश और उनकी संधि अभी कायम है। वारसा संधि के ही एक देश यूक्रेन ने जब नाटो में शामिल होने का निर्णय लिया तो रूस ने इसे अपनी प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए चुनौती माना और उस पर आक्रमण कर दिया। दो साल हो गए, यह भयानक युद्ध अब भी जारी है जिसमें धन-धन-संसाधन की अपरिमित क्षति हो रही है, पर्यावरण नष्ट हो रहा है वह अलग। पश्चिम एशिया की स्थिति उतनी ही विस्फोटक बनी हुई है, वह भी दशकों से। मोटे तौर पर देखें तो लगभग एक तिहाई दुनिया युद्ध ग्रस्त है। युद्ध और संघर्ष जब लंबा चलता है तो लोग उसके आदि हो जाते हैं। संवेदना कुंद हो जाती है, युद्ध भी मानो एक आम स्थिति बन जाता है। अब सवाल उठता है कि युद्ध इतने-इतने वर्षों तक आखिर क्यों चलते रहते हैं? क्या युद्ध की स्थिति जबरन पैदा कराई जाती है दो देशों के बीच या एक ही देश के अंदर दो विरोधी गुटों के बीच? देखने की बात यह है कि विश्व अर्थव्यवस्था में विशेषकर विकसित देशों की अर्थव्यवस्था में हथियार-उत्पादन का हिस्सा और भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। हथियार बेचना शायद सबसे अधिक मुनाफे वाला धंधा है। अब हथियार उत्पादन चलता रहे, इसके लिए उसकी खपत भी तो होनी चाहिए। और वह तो तभी संभव है जब दो या अधिक देश उलझें। आजकल हथियार-निर्माण और उत्पादन तथा खरीद के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि यथास्थिति बनाए रखने के लिए यह जरूरी है। श्रेष्ठ हथियार शत्रु देश को आक्रमण करने से रोकते हैं। यही तर्क परमाणु हथियारों के बारे में भी दिया जाता है। इस तर्क से हथियारों की होड़ पैदा होती है, फिर इसका लाभ किसको मिलता है? अब इस पूरी स्थिति को मनुष्यता के पैमाने पर देखेंगे तो मानव सभ्यता का भविष्य ही धुंधला नजर आने लगता है। दुनिया का कोई धर्म इस स्थिति को बदलने में सक्षम नहीं दिख रहा क्योंकि धर्म-मजहब आपस में प्रतियोगी हैं, यह तो एक बात है। दूसरी बात यह कि एक ही धर्म-पंथ को मानने वाले एक-दूसरे को मिटाने पर अमादा हैं। रूस-यूक्रेन ईसाई देश हैं। मध्य-पूर्व के युद्धग्रस्त और कलग्रस्त देश एक ही धर्म-पंथ इस्लाम को मानने वाले हैं। वे एकमात्र छोटे से यहूदी देश इजराइल को भले घेरे हुए हैं लेकिन वे उसके अस्तित्व और आक्रामकता को लेकर एकमत नहीं है, एक नीति पर नहीं है। अफ्रीका के भी कुछ देश लंबे समय से युद्धग्रस्त हैं या फिर गृहयुद्ध झेल रहे हैं – सूडान, सोमालिया, इथियोपिया, कांगो, रवांडा आदि देश। अब इन देशों की स्थिति शायद ही किसी को उद्वेलित करती है। कुछ संवेदनशील विश्व नागरिक भी इसे उनकी नियति मान लेते हैं और संतोष कर लेते हैं।

इस प्रकार चाहे वह राष्ट्रीय स्तर पर हो या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, राजनीति में संवेदना की अनुपस्थिति इस युग का सबसे बड़ा संकट है। संवेदना का आश्रय स्थल साहित्य है, कलाएं हैं। इसी से साहित्य को मनुष्यता का मार्ग प्रशस्त करने वाला प्रकाश स्तंभ या वह मशाल कहते हैं जो राजनीति को, समाज को रास्ता दिखाता है। साहित्य मूल्यों का कोषागार भी है। अफसोस कि साहित्य ने राजनीति का अनुगामी बनकर अपनी स्वायत्तता खो दी, गरिमा गिरा दी। इसीलिए आज लेखक-साहित्यकारों की भी कोई प्रभावी अपील समाज में नहीं रह गई। आज कोई लेखक-साहित्यकार किसी विषय पर राय भी देता है तो उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि टटोली जाती है। स्वयं उसके समानधर्मा साहित्यिक यह काम आगे बढ़कर करते हैं। इस वजह से भी आम आदमी का सांस्कृतिक आधार सिमटा है।

दूसरी ओर टीवी चैनलों की कारपोरेट पत्रकारिता ने समाचारों का वस्तुकरण करके रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। नकारात्मक और त्याज्य खबरों की बारम्बारता, नकारात्मकता का महिमा मंडन, साधारण समाचारों को भी सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करना, निरर्थक और स्तरहीन बहसों और चर्चाओं को प्रश्रय जिससे कि सामुदायिक संबंधों में तनाव पैदा हो, जनमानस पर समाचारों के प्रभाव को लेकर असंवेदनशीलता – यह सब वे कारण हैं जिनसे हमारा सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। चैनलों ने युद्धों और विभीषिकाओं के प्रति भी जनमानस को असंवेदनशील बना दिया है। जिन समाचारों से वितृष्णा होनी चाहिए, उन्हें भी मनोरंजक और ग्राह्य बनाने की कोशिश होती है, आदमी उनमें भी रस लेने लगता है। यह बहुत दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

सबसे अधिक चिंता का विषय तो यह है कि इन परिस्थितियों में भावी पीढ़ी को, अपने बच्चों के हाथ में कैसी दुनिया हम सौंप रहे हैं – सौमनस्यता और सहानुभूति के उजाड़ में क्या वे उसे शाश्वत विरह का मूल्य समझ पाएंगे जो संवेदना के रूप में हमारे मन में उमड़ती है, जो वास्तव में एक अस्तित्व को दूसरे से जोड़ती है!
——
द्वारा: शिवदयाल.

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