मानवीय संवेदनाओं का बहु आयामी चित्रण है सिनेमा
राजेश कुमार सिन्हा
सिनेमा एक ऐसा लोकप्रिय दृश्य श्रव्य माध्यम है जिसमें हम किसी न किसी कहानी के रूप में अपने संघर्ष ,प्रेम, करुणा, भय, विद्रोह और आशा से रूबरू होते रहते हैं। मनुष्य अपने भीतर जितने आयामों के साथ, अपने सपनों के साथ, स्मृतियों के साथ, कटु सच्चाइयों के साथ, और उन भावनात्मक तूफ़ानों के साथ जीता है,जिनके बारे में वह स्वयं भी कई बार अनभिज्ञ होता है,उन सबका विराट और प्रभावशाली रूपांतरण सिनेमा करता है। साहित्य, संगीत, चित्रकला, रंगमंच और मनोविज्ञान इन सभी कलाओं का सम्मिलित समन्वय जब परदे पर दर्शक के सामने उपस्थित होता है, तब उसे केवल मनोरंजन नहीं कहा जा सकता बल्कि उसे मनुष्य के हृदय की सबसे सघन और जटिल परतों को उजागर करने वाली एक बहु आयामी कृति कहना ज्यादा उपयुक्त होगा।
सिनेमा के जन्म की कथा ही मनुष्य की उस जिज्ञासा से शुरू होती है जिसके कारण उसने हर गतिमान वस्तु के भीतर छिपे जीवन को पहचानने की कोशिश की। जब लुमियर बंधुओं का पहला चलचित्र दिखाया गया, तब दर्शकों का अचानक उछल पड़ना केवल तकनीकी चमत्कार का परिणाम नहीं था, बल्कि इसलिए था कि पहली बार मनुष्य को अपनी ही दुनिया को चलायमान, सजीव और अपनी तरह मनोवेगों से भरी हुई तस्वीरों में देखने का अवसर मिला। यहीं से सिनेमा केवल एक खोज नहीं रहा; वह मनुष्य की हर भावाभिव्यक्ति का स्वाभाविक आश्रय बन गया ।बेशक, चाहे वह चार्ली चैपलिन की करुणा में छिपी हँसी हो, चाहे इतालवी नव यथार्थवाद सिनेमा की गरीब, संघर्ष रत और बेचैन गलियाँ, चाहे भारतीय सिनेमा के सामाजिक विमर्श सभी ने हमेशा मानव जीवन के संपूर्ण स्पेक्ट्रम को आत्मसात किया है।
समय के साथ सिनेमा ने इस बहु आयामी मानवीय संवेदनशीलता को केवल विस्तार नहीं दिया बल्कि उसे सूक्ष्मतम स्तरों पर स्थापित भी किया। सत्यजित रे की “पाथेर पांचाली” हो या बिमल रॉय की “दो बीघा जमीन” इन फिल्मों ने गरीबी, विस्थापन और मनुष्य की असहायता को इस प्रकार रूपायित किया कि दर्शक स्वयं इन पात्रों के दुख सुख का हिस्सा बन गए। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में “द बाइसाइकिल थीव्स” या “लाईफ इज ब्यूटीफुल” जैसी फिल्मों ने मानव सभ्यता के दर्द, युद्ध की त्रासदी और उम्मीद की रोशनी को इतने संवेदनशील ढंग से चित्रित किया कि सिनेमा ग्लोबल मानवीय अनुभवों का अनिवार्य दस्तावेज बन गया।
दरअसल मानवीय संवेदना का यह चित्रण सतही नहीं होता बल्कि यह उन सूक्ष्म अन्तरों को पकड़ता है जो मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं। प्रेम की स्थिति को ही देखा जाए तो यह केवल रोमांस नहीं; यह आकर्षण, असुरक्षा, एकांत, स्वीकृति, खोना और पुनः पाने की लालसा का जटिल मिश्रण भी तो है। अगर हम “बिफोर सन राइज” जैसी पश्चिमी फिल्मों के अनुभव या भारतीय संदर्भ में “लम्हे” जैसी फिल्मों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि ये दोनों ही फिल्में प्रेम के उन मनोवैज्ञानिक पहलुओं को स्पर्श करती हैं, जिन्हें कहने के लिए सामान्य अनुभव में शब्द भी नहीं मिलते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिनेमा इन अस्पष्ट भावनाओं को आकार देता है, उन्हें रंगों, संवादों , खामोशी ,नजरों की टकराहट और भावनाओं के उतार चढ़ाव में तब्दील करता है।यदि दुख की बात करें तो सिनेमा ने मानवीय पीड़ा के इतने रूप प्रस्तुत किए हैं कि वे स्वयं एक सांस्कृतिक अध्ययन का आधार बन सकते हैं। स्टीवन स्पीलवर्ग के निर्देशन में बनी “सिंडलर्स लिस्ट” जैसी फिल्मों में दुख महज़ दृश्य नहीं है; वह मानव इतिहास की नैतिक असफलताओं का साक्ष्य बन जाता है। भारतीय संदर्भ में इसी तथ्य अर्थात जीवन मृत्यु के दार्शनिक अर्थ को फिल्म “आनंद” में इस तरह उजागर किया गया है कि है कि मृत्यु की स्वीकृति भी जीवन का उत्सव बन जाती है। यह वही सिनेमा है जो भावनाओं के सतह पर नहीं रुकता; वह उनकी जड़ों तक जाता है।सिनेमा का यह बहु आयामी भाव परिदृश्य सामाजिक अनुभवों के माध्यम से और अधिक व्यापक हो जाता है। वर्ग संघर्ष, जातिगत असमानता, लैंगिक पीड़ा, महिला स्वतंत्रता, प्रवासन, राजनीतिक उत्पीड़न आदि सभी स्थितियों का चित्रण करते हुए सिनेमा सामाजिक संवेदनाओं को भी रूप प्रदान करता है। श्याम बेनेगल की फिल्म “अंकुर” मृणाल सेन की “मृगया” या मीरा नायर की “सलाम बॉम्बे” केवल कहानी नहीं बल्कि समाज के छिपे दुखों, उम्मीदों और विद्रूपताओं को मानवीय दृष्टि से सामने लाती हैं।
सिनेमा की यह संवेदनात्मक दृष्टि कलात्मक उपकरणों से भी गढ़ी जाती है। कैमरे की भाषा, प्रकाश का चयन, रंगों के शेड, संगीत के स्वरों की तीव्रता या उनका मद्धिम होना और सबसे अहम बात मौन की गूंज जो कई बार शब्दों से अधिक मुखर हो जाता है। किसी पात्र की आँखों में उतरता अकेलापन, किसी कमरे में फैली उदासी की धुंध, किसी शहर के शोर में छिपा अवसाद जैसी बारीकियों को भी सिनेमा पकड़ लेता है और दर्शक को उन भावनाओं से परिचित कराता है जिनसे वह शायद अपने जीवन में भी दो चार होता है पर उन्हें व्यक्त नहीं कर पाता।यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात यह होती है कि सिनेमा अपनी संवेदनाओं के चित्रण में समय और इतिहास को भी समाहित करता है। जिस तरह “रंग दे बसंती” में युवा पीढ़ी का आक्रोश इतिहास से संवाद करता है, या “स्वदेश” में प्रवासी भारतीय का द्वंद्व आधुनिक भारत की वास्तविकताओं से जुड़ता है, उसी तरह फिल्में समाज के मनोविज्ञान में परिवर्तन का दस्तावेज बन जाती हैं। यह परिवर्तन भावनात्मक भी होता है क्योंकि स्वतंत्रता के आदर्शवाद से लेकर आज के भौतिकवादी संघर्षों तक, सिनेमा हमारी भावनाओं की दिशा और तीव्रता को दर्ज करता चलता है।मानवीय संवेदना का सबसे बड़ा परीक्षण उन स्थितियों में होता है जहाँ मनुष्य अपने आप से लड़ रहा होता है और आधुनिक सिनेमा ने इन संघर्षों जैसे डिप्रेशन, अकेलापन, अस्तित्व संकट, पहचान की उलझन आदि को बेहद गहराई से प्रस्तुत किया है। फिल्म “टैक्सी ड्राइवर” या जोकर जैसे उदाहरण आधुनिक व्यक्ति के विखंडित मानसिक संसार को उजागर करते हैं। भारतीय संदर्भ में “तमाशा” या “मसान” जैसी फिल्में मनुष्य के भीतर छिपे अभाव, असमानता के घाव और आत्मचेतना के द्वंद्व को सामने लाती हैं।सिनेमा का यह बहु स्तरीय भाव चित्रण उसे संस्कृतियों के बीच सेतु का काम भी देता है। जापानी फिल्म “एकर्यू” हो या ईरानी फिल्म “ए सेपरेशन” ये सभी फिल्में विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से होने के बावजूद दर्शक के भीतर एक साझा भावनात्मक आलोक जगाती हैं। मनुष्य की संवेदनाएँ जितनी विशिष्ट होती हैं, उतनी ही सार्वभौमिक भी और सिनेमा इस विशिष्टता और सार्वभौमिकता के अद्भुत संतुलन को साध लेता है।सिनेमा का यह ग्लोबल मानवीय स्वरूप आज के डिजिटल युग में और अधिक प्रखर हुआ है। स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स ने दुनिया की फिल्मों को अपने दरवाज़े पर ला खड़ा किया है। अब एक भारतीय दर्शक दक्षिण कोरिया की “पैरासाइट” को भी बड़े ही सहजता से देखता है जिस सहजता से वह एक हिंदी फिल्म देखता था । इससे संवेदनाओं का ग्लोबल आदान-प्रदान संभव हुआ है और इसका असर यह भी हुआ है कि कहानी के वृत्तांत बदल गए हैं, चरित्रों की जटिलता बढ़ गई है, और मनुष्य की मनोवैज्ञानिक गुत्थियों को नए आयाम मिले हैं।
सिनेमा के एक बेहतरीन दृश्य श्रव्य माध्यम होने के कारण यहाँ भावनाएँ केवल अभिव्यक्त नहीं की जातीं बल्कि उन्हें दर्शक अनुभव करता है और यह अनुभव ही सिनेमा को अन्य कलाओं से अलग करता है। जब दर्शक “मदर इंडिया” में राधा की माँ और किसान दोनों रूपों के संघर्ष को देखता है, तो वह केवल अभिनय नहीं देख रहा होता अपितु वह भारत के ग्रामीण जीवन की जटिलताओं, उस समय की गरीबी, सामाजिक मान्यताओं और स्त्री शक्ति की उभरती पहचान को भी महसूस कर रहा होता है और यही अनुभूति दर्शक को भीतर तक प्रभावित करती है। एक और विशेष बात कि सिनेमा भावनाओं को केवल प्रस्तुत नहीं करता, वह उन्हें गढ़ता भी है क्योंकि इतिहास साक्षी है कि कई बार फिल्मों से ही समाज में करुणा, साहस या परिवर्तन की लहर पैदा होती है। यही कारण है कि डॉक्यूमेंट्री सिनेमा भी संवेदनाओं का समान रूप से प्रभावशाली माध्यम माना जाता है। जलवायु संकट पर बनी फिल्मों से लेकर युद्धग्रस्त बच्चों पर आधारित ,ये सभी दर्शक के भीतर मानवीय जिम्मेदारी का भाव उत्पन्न करती हैं। इसी प्रकार “ब्लैक” ने विकलांगता के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण को रेखांकित किया और “तारे जमीन पर” ने बच्चों की मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को घर घर तक पहुँचाया।
यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सिनेमा मानवीय अनुभवों का विश्वकोश है,एक ऐसा विश्वकोश जो न केवल चरित्रों, परिस्थितियों और कथाओं को दर्ज करता है, बल्कि मनुष्य के भीतर उठने वाली सबसे सूक्ष्म भावनाओं को भी संरक्षित कर देता है और यही कारण है कि जब कोई महान फिल्म समाप्त होती है, तो दर्शक केवल कहानी से बाहर नहीं आता; वह अपने भीतर एक नई संवेदना, एक नया विचार और एक नई दृष्टि लेकर निकलता है। ऐसा कहते हैं कि धीरे धीरे गहराई में उतरते हुए या कभी अनजाने में सिनेमा उसे बदल देता है । इसके अलावा यह बहुआयामी संवेदनात्मक संरचना सिनेमा को एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक शक्ति भी बनाती है। वह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जनचेतना का विस्तार है जो समाज को आइना दिखाता है और कभी-कभी उसके भीतर छिपी संवेदनशीलता को पुनर्जीवित भी करता है। इसी कारण से सिनेमा समय समय पर राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनता रहा है क्योंकि मानवीय संवेदनाएँ केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, वे सामूहिक चेतना का आधार भी हैं।
यानी सिनेमा इस सत्य को पुष्ट करता है कि मनुष्य अपने अस्तित्व को समझने के लिए जितने साधनों का उपयोग करता है, उनमें सिनेमा सबसे व्यापक, सबसे सूक्ष्म और सबसे ज्यादा बहुआयामी है, क्योंकि वह केवल कहानी नहीं सुनाता बल्कि वह मनुष्य को उसके भीतर ले जाकर उसकी उन भावनाओं से परिचित कराता है जिन्हें वह अपनी व्यस्त दिनचर्या में भूल चुका होता है। यही कारण है कि सिनेमा को मानवीय संवेदनाओं का सबसे जीवंत, सबसे विस्तृत और सबसे गहन अभिलेखागार कहा जाता है। थोड़े में कहें तो सिनेमा मनुष्य को न केवल स्वयं से जोड़ता है, बल्कि मनुष्य को मनुष्य से भी जोड़ता है। यही उसका सबसे बड़ा ग्लोबल महत्त्व है कि वह हम सबको हमारी साझा मानवता का स्मरण कराता है।



