विकल्पहीनता का बेजा लाभ न उठाये सरकार
अनिल विभाकर
भाजपा चलने लगी अब कांग्रेसी चाल। पुरानी राह पर चल रहे विपक्षी दलों का भी नहीं है कोई अच्छा हाल। यूजीसी की नई गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट की अस्थाई रोक से कुछ समय के लिए आंदोलन तो जरूर थम गया मगर केन्द्र सरकार के सामने यह संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। नई गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के विरुद्ध दलितों – पिछड़ों ने सड़कों पर उतरने का खुला एलान कर दिया है। वे सर्वोच्च न्यायालय के जजों पर भी सवालों के जहर बुझे तीर छोड़ने लगे हैं । इसलिए केन्द्र सरकार के सामने यह संकट अभी कायम है जो कभी भी विस्फोटक रूप ले सकता है। भाजपा और मोदी सरकार कांग्रेस जैसी ऐसी विभाजनकारी चाल नहीं चलती तो उसके सामने “आ बैल मुझे मार” की यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती। उसने तो बैठे – बिठाये यह संकट खुद मोल ले लिया।
इस वर्ष पांच राज्यों में विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं फिर भी कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी दल आत्ममंथन करते नहीं नजर आ रहे। दरअसल विपक्ष का रवैया जनहितकारी नहीं बल्कि विभाजनकारी हो गया लगता है। जनभावना और जनादेश का उनके लिए जैसे कोई महत्त्व ही नहीं रह गया । ऐसा लगता है कि जैसे देश में अस्थिरता उत्पन्न करना विपक्षी दलों का मुख्य ध्येय हो। विपक्षी दल चीख-चीख कर “वोट चोर गद्दी छोड़” का नारा यदि अब भी लगाते रहे और बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी हार की असली वजह से मुंह चुराते रहे तो भविष्य में उनका अस्तित्व खतरे में पड़ना तय है।
देश के जिन पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वे हैं पश्चिम बंगाल, असम , पंजाब, तमिलनाडु और केरल । इनमें असम छोड़ शेष चार राज्यों में भाजपा के धुर विरोधी दलों की सरकारें हैं। केरल में कम्युनिस्ट पार्टी, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस , तमिलनाडु में डीएमके और पंजाब में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की सरकार है । भाजपा को यह पूर्ण विश्वास है कि असम में वह आसानी से अपनी सरकार फिर बना लेगी। जहां तक पंजाब की बात है , वहां भाजपा की न तो वैसी सांगठनिक क्षमता है और न प्रभाव जिससे वह सरकार बना सके। बाकी बचे तीन राज्य जिनमें पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव जीतना भाजपा की शीर्ष प्राथमिकता है। इसके लिए वह पिछले तीन बार से ममता बनर्जी यानी तृणमूल कांग्रेस को शिकस्त देने की कोशिश कर रही है। इस कोशिश में अब तक उसे विफलता ही हाथ लगी । इसका उसे सिर्फ यह फायदा हुआ कि वह पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल बन गई और कांग्रेस और माकपा का सूपड़ा साफ हो गया। इस बार विधानसभा चुनाव में वह हर हाल में तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करना चाहती है। पिछले वर्ष नवम्बर में बिहार विधानसभा के चुनाव में एनडीए की प्रचंड जीत पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा भी कि गंगा बिहार से बंगाल जाती है । स्पष्ट है कि भाजपा अबकी बार पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए पूरी ताकत झोंकेगी।
पिछले ग्यारह साल से केन्द्र की सत्ता पर काबिज भाजपा नीत एनडीए सरकार की यह सबसे बड़ी कमी है कि अब वह अपने कोर वोटर की घोर उपेक्षा करने लगी । रह- रह कर वह ऐसी- ऐसी गलतियां कर रही है जिससे प्रतीत होता है कि उसने अब कांग्रेस के विघटनकारी मार्ग पर चलना शुरू कर दिया है । उसके समर्थकों का भाजपा से इसलिए मोहभंग होने लगा है। यूजीसी का नया दिशा निर्देश केन्द्र सरकार की वैसी ही विघटनकारी नीतियों में से एक है जिससे उपजे जनाक्रोश शांत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को आगे आना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नये दिशा निर्देश पर रोक लगा दी और कहा “इसकी भाषा अस्पष्ट है। इसके खतरनाक परिणाम होंगे। समाज में इससे विभाजन होगा और गंभीर प्रभाव होंगे। “सुप्रीम कोर्ट ने कहा लगता है “हम प्रतिगामी समाज बनते जा रहे हैं” । ताज्जुब तो यह है कि यूजीसी की नई गाइडलाइन के विरुद्ध जब बवाल मचा तो केन्द्र सरकार और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान इसके बचाव में उतर आये । उन्होंने यूजीसी की गाइडलाइन को सही ठहराते हुए यहां तक कहा कि इसे लेकर कर लोगों में भ्रम फैलाया जा रहा है जो उचित नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार और धर्मेन्द्र प्रधान के भ्रम का यह भूत एक झटके में उतार दिया। वास्तव में यूजीसी की यह गाइडलाइन 1871 में अंग्रेजों के बनाये गये उस क्रिमिनल ट्राइब्स ऐक्ट जैसी है जिसमें आदिवासी समेत हिन्दुओं की लगभग दो सौ जातियों को जन्मजात अपराधी माना जाता था। यूजीसी की नई गाइडलाइन में भी सामान्य वर्ग यानी सवर्ण जातियों को एससी – एसटी और ओबीसी पर अत्याचार करने का जन्मजात अपराधी ही माना गया है। इसमें यह मान लिया गया कि दलित – ओबीसी पर केवल सवर्ण ही अत्याचार करते हैं जबकि आंकड़े यह बताते हैं कि दलितों – आदिवासियों पर अत्याचार की सर्वाधिक 81 फीसद घटनाओं में ओबीसी के लोग शामिल हैं , सवर्ण नहीं। यूजीसी का इस समय कोई अध्यक्ष नहीं है। यह सीधे केन्द्र सरकार के नियंत्रण में है। इसलिए यूजीसी की यह गाइडलाइन सरकार ने अनजाने में नहीं बल्कि बहुत सोच विचार कर जारी की है। इससे केन्द्र सरकार और भाजपा को चुनाव में कितना नुकसान होगा यह सहज ही समझा जा सकता है। भाजपा और केन्द्र सरकार का यह कदम समाज और देश के लिए अत्यंत विघटनकारी है । उसके के लिए यह आत्मघाती तो है ही, इससे उसकी नीयत पर भी सवालिया निशान लग गया। इसके कारण हिन्दुओं की एकजुटता के लिए प्रधानमंत्री मोदी के “एक रहेंगे , सेफ रहेंगे” के नारे में पलीता लग गया। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” का नारा भी संदिग्ध हो गया।
राजनीतिक परिदृश्य पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि भारत में इस समय राजनीतिक विकल्पहीनता का दौर चल रहा है । भाजपा को इसी का लाभ मिल रहा है। जनता के पास भाजपा को वोट देने के सिवा कोई विकल्प नहीं। आखिर भाजपा और केन्द्र सरकार ने ऐसा आत्मघाती निर्णय क्यों लिया ? ऐसे आत्मघाती कदम तो हमेशा कांग्रेस उठाती है। देश के बहुसंख्यक समाज का विघटन और अगड़ा-पिछड़ा , दलित – ओबीसी जातियों को आपस में लड़ाने की नीति तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की रही है। विपक्षी दल तो धर्मनिरपेक्षता यानी मुस्लिम परस्ती की राजनीति करते रहे हैं । विपक्षी दलों से यहां का बहुसंख्यक समाज इसलिए खासा नाराज है। अल्पसंख्यक परस्ती के कारण ही जनता ने केन्द्र की सत्ता से कांग्रेस को बेदखल कर दिया और पूरे देश में कांग्रेस का जनाधार लगभग समाप्त हो गया। एक समय था जब केन्द्र के साथ ही पूरे देश के अधिसंख्य राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हुआ करती थीं । एकछत्र राज था कांग्रेस का पूरे देश पर। इस समय वह केन्द्र की सत्ता से बाहर है और केवल दो राज्यों में उसकी सरकारें हैं। भाजपा की स्थिति इससे ठीक उलट है। पता नहीं भाजपा कांग्रेस के रास्ते पर क्यों और किस लोभ में चल पड़ी ? यूजीसी की नई गाइडलाइन तो कांग्रेस की लाइन है। लगता है भाजपा में भी कांग्रेसी मानसिकता के कुछ लोग हैं जो मोदी सरकार की उपलब्धियों से खुश नहीं। उन्हें बहुसंख्यक समाज की एकजुटता भी पसंद नहीं। इसलिए रह- रह कर वे सरकार और पार्टी हित के विरुद्ध इस तरह का षड्यंत्र करते रहते हैं। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें अविलंब बाहर का रास्ता नहीं दिखाया तो पार्टी और केन्द्र सरकार को भारी नुकसान होना तय है। भाजपा और मोदी सरकार के लिए राहत की बात सिर्फ यह है कि कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां बीते वर्ष नवम्बर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी जबरदस्त हार पर आत्मचिंतन नहीं करना चाहतीं । वह तो पहाड़ जैसी अपनी गलतियों और गुनाहों को तिनके के पीछे छिपाना चाहती है। तिनके के पीछे पहाड़ कभी छिप नहीं सकता। राहुल गांधी खुलेआम कहते हैं कि उनकी लड़ाई किसी सरकार से नहीं, उनकी लड़ाई तो इंडियन स्टेट से है। मतलब यह कि कांग्रेस देश के खिलाफ युद्ध कर रही है। वह देश के टुकड़े करना चाहती है जिसमें अपने छोटे – छोटे स्वार्थ के लिए यहां के अधिकतर विपक्षी दल उसके साथ हैं। सर्वोच्च न्यायालय और अन्य सभी संवैधानिक संस्थाओं पर विपक्ष इसलिए हमले कर रहा है ताकि देश की अखंडता कमजोर हो और लोकतांत्रिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाय। भाजपा और मोदी सरकार विकल्पहीनता का बेजा लाभ न उठाये और आत्ममंथन करे तो अच्छा होगा।


