Book a Call

Edit Template

लखनऊ के लड़के ने वियतनाम में मचाया कोहराम

लखनऊ के लड़के ने वियतनाम में मचाया कोहराम

लखनऊ के लड़के ने वियतनाम में मचाया कोहराम

कैसे एक गाँव के इंजीनियर का सपना दुनिया के मंच पर पहुंचा

जब नवाचार के बारे में बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं तो अक्सर बातचीत शहरों के फैंसी लैब्स और बड़े बड़े संस्थानों तक सीमित हो जाती है। लेकिन शहरी परिवेश में पले-बढे और शिक्षित हुए परन्तु मन में कुछ अलग करने का सपना संजोकर ग्रामीण संस्कृति को आत्मसात करने वाले समीर कुमार मिश्रा की कहानी बिल्कुल अलग है। समीर लखनऊ में पले-बढे, लेकिन उनके सपनों ने आकर लेना शुरू किया उड़ीसा के सुदूर गांवों में, जहां के आदिवासी और गरीब बच्चों को; वैसे परिवार से आनेवाले बच्चे जो सदियों- सदियों तक शिक्षा की रौशनी से महरूम रहे, समीर विज्ञान सिखाना चाहते थे. इन बच्चों को न सिर्फ वे विज्ञान सिखाना चाहते थे बल्कि उनका पूरा जोड़ इस बात पर था कि उनके दिलो-दिमाग में विज्ञान के प्रति उत्सुकता जगे और एक उनमे एक वैज्ञानिक मानसिकता का जन्म हो. इनके जीवन में समीर के आगमन से पहले इन बच्चों के पास ऐसा कोई मौका उपलब्ध नही था. समीर ने अपनी इसी उर्जा और लगन के कारण हाल ही में वियतनाम की विदेशी सरजमीं पर भी ख्याति अर्जित की है. यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के बारे में नहीं है – यह हजारों बच्चों के जीवन बदलने की कहानी है।

थॉन्ग न्हाट इनोवेशन हब में भारत का प्रतिनिधित्व करते समीर

समीर की यात्रा एक दिन की यात्रा नही है। उसमे वर्षों का संघर्ष, तप और त्याग है. समीर ने मनिपाल यूनिवर्सिटी, जयपुर, से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद आईआईटी मुंबई से मास्टर किया। शुरुआत में उन्होंने एक अच्छी कंपनी में काम भी किया, जो मेटल रीसाइक्लिंग की बिज़नेस से संबंधित था। लेकिन कुछ समय बाद उन्हें लगा कि वह इसके लिए नही बने हैं। तब उन्होंने एक अलग रास्ता चुनते हुए स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की प्रतिष्ठित “यूथ फॉर इंडिया फेलोशिप” के लिए आवेदन किया, जहाँ एक कठिन चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद उपरोक्त फ़ेलोशिप के लिए उनका चयन हुआ. इस फैसले ने उनके जीवन को न सिर्फ एक नयी दिशा दी अपितु उनके सपनों को भी एक नया पंख दिया.

 

ग्राम विकास स्कूल के बच्चों के साथ समीर

इस फेलोशिप के दौरान समीर उड़ीसा के “ग्राम विकास” नाम की संस्था के साथ काम करने लगे। ग्राम विकास पिछले चार दशकों से भी ज्यादा समय से उड़ीसा के सुदूर ग्रामीण इलाकों में शिक्षा, पानी और स्वछता के क्षेत्र में प्रशंसनीय कार्य करता रहा है. समीर ने ग्राम विकास के साथ शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हुए वहां मौजूद असली समस्याओं को समझा। ग्राम विकास उड़ीसा के तीन अलग-अलग जिलों में चार विद्यालय संचालित करता हैं जहाँ ज्यादातर आदिवासी बच्चे पढ़ते हैं. एक विद्यालय कालाहांडी जिले के थुआमूल रामपुर में हैं जहाँ आज भी टेलीफोनिक नेटवर्क मौजूद नही है. दूसरा स्कूल गजपति जिले के कोइनपुर में स्थित है, चारों तरफ खुबसूरत पहाड़ियों से घिरा हुआ. तीसरा स्कूल ब्रह्मपुर शहर से करीब 15 किमी दूर स्थित काकिया में हैं जो गंजाम जिले में पड़ता है. और चौथा स्कुल गंजाम जिले के ही सीमावर्ती क्षेत्र में रुढ़ापदर नामक जगह पे स्थित है. इं विद्यालयों में ज्यादातर आदिवासी बच्चे पढ़ते हैं. अगर काकिया वाले स्कूल को छोड़ दिया जाए तो बाकी के तीनो विद्यालय शहरों से काफी दूर सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में स्थित हैं. समीर ने रुढ़ापदर वाले स्कुल में काम करना प्रारम्भ किया, और उन्होंने बच्चों को विज्ञान सिखाने का निर्णय लिया. इस स्कुल में पढ़ने वाले बच्चों को विज्ञान सिखाते समय सबसे बड़ी दिक्कत थी यह थी कि उनके पास विज्ञान को प्रैक्टिकल रूप में सिखने के लिए साधन-संसाधन मौजूद नही थे। सब कुछ सिर्फ किताबों में। कोई लैब नहीं, कोई एक्सपेरिमेंट नहीं, कोई इसलिए बच्चों को विज्ञान सिखने में कोई मजा भी नहीं। ये बच्चे ज़्यादातर पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी थे, उनके माता-पिता किसान और मज़दूर थे।

सुदूर ग्रामीण विद्यालय में बना पहला नवोन्मेष प्रयोगशाला

लेकिन जो बात समीर ने इन बच्चों में देखी वह यह थी कि इनके अन्दर प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी। बस इनके पास अवसर नहीं था। समीर ने इन बच्चों के लिए कुछ अलग हटकर करने का प्रयास किया. उन्होंने अपनी मेहनत और सोंच से इस विद्यालय में एक विज्ञान-आधारित प्रयोगशाला का निर्माण किया जिसका नाम उन्होंने “नवोन्मेष प्रयोगशाला” रखा। सरल सी बात थी कि स्कूल में जो भी सामान मौजूद था, जो कुछ भी गांव में मिल सकता था, समीर ने उन्हीं सामानों के सहारे बच्चों को विज्ञान सिखाने का निर्णय लिया। पेरिस्कोप, एनीमोमीटर, ये सब चीज़ें बनायी जा सकती थी साधारण सामान से, जो इस प्रयोगशाला में बनायी गयी. और सबसे अच्छी बात यह थी इस प्रयोग्शाले के निर्माण के बाद विज्ञान सिखने के लिए बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था।

धीरे धीरे, यह एक बड़े प्रोजेक्ट में बदल गया। समीर ने “नव कौशल” के नाम से एक अलग काम शुरू किया। इसका मक़सद था ऐसी ही नवाचार प्रयोगशालाएं और भी कई जगह खोलना जहां बच्चों को सीखने का मौका मिले। आज तक उन्होंने 10 से ज़्यादा लैब्स खोल दिए हैं और 6000 से भी ज़्यादा आदिवासी बच्चों को ट्रेनिंग दी है।

जीवन बदलने की असली कहानियां

लेकिन इस सफ़र की असली कामयाबी संख्याओं में नहीं, बल्कि बच्चों के जीवन में दिखती है। एनजीओ “जलजीविका” के साथ काम करते हुए समीर ने तीन लड़कियों को, जो मछुआरे और किसान परिवार से थीं, विशेष ट्रेनिंग दी थी। उन्हें कम्युनिकेशन और कॉर्पोरेट कल्चर में काम करने की ट्रेनिंग दी। इसका परिणाम क्या हुआ? ये तीनों लड़कियां पूरी स्कॉलरशिप के साथ “मर्चेंट नेवी कोर्स” में सिलेक्ट हो गईं। अब जो लड़कियां कभी अपने गांव से बाहर नहीं निकली थीं, वह अब समुद्र में नौकायन कर रहीं हैं।

वॉटर रॉकेट का प्रशिक्षण करते हुए आदिवासी गांव के बच्चे

समीर का सबसे बड़ा सपना था आदिवासी लड़कियों की शैक्षणिक स्थिति में बदलाव. पहले इन लड़कियों की जल्दी शादी कर दी जाती थी, उनका कोई भविष्य नहीं था। लेकिन इन लैब्स की मदद से, अब ये लड़कियां 3डी प्रिंटर जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ काम कर रहीं हैं। वह अपने आइडिया को प्रोटोटाइप में बदल सकती हैं। शिक्षा ने उन्हें सशक्त बना दिया है।

यह सिर्फ लड़कियों की कहानी नहीं है। ऐसे कई लड़के थे जो स्कूल छोड़कर मज़दूरी करने लगे थे। मजबूरी की वजह से किसी और रास्ते पर चले गए थे। लेकिन इन नवाचार लैब्स की मदद से वह फिर से स्कूल लौटे। आज कुछ तो “कम्प्यूटर इंजीनियरिंग” जैसे कोर्स कर रहे हैं, और कुछ स्कूलों में शिक्षक के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी समुदाय का ही भविष्य बदल दिया है।

समीर, वियतनामी प्रतिनिधिमंडल के साथ

भारत में पहली बार एक दूरदराज के गांव में “अटल टिंकरिंग लैब” खोला समीर की टीम ने। निति आयोग के द्वारा दी गयी आर्थिक मदद से ग्राम विकास ककिया स्कुल में इस अटल टिंकरिंग लैब की स्थापना की गयी. कार्पेंट्री, इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स – सब कुछ है इस लैब में। और इसी लैब से एक बच्चा निकला जिसने कोविड महामारी के समय एक अद्भुत आइडिया दिया। उसने “बांस की स्ट्रेचर” बनाई जिससे रोगियों को दूरदराज के इलाकों में ले जाया जा सके, जहां न तो अस्पताल है न कोई अन्य सुविधा। भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग से उसे “इंस्पायर अवार्ड मानक” मिला। एक गांव के बच्चे के द्वारा इजाद की गयी चीज ने कई जरूरतमंद लोगों की जान बचाई।

नीति आयोग की मदद से खोली गई इन सभी लैब्स में, हज़ारों बच्चों ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लिया है। कई को पुरस्कार मिल चुके हैं। कई को छात्रवृत्तियां मिली हैं। नासा और जर्मन एयरोस्पेस सेंटर ने भी इन बच्चों के काम की तारीफ़ की है। पर सबसे ज़रूरी बात यह है – ये बच्चे अब अपने आप पर विश्वास करते हैं।

मिनिस्ट्री ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, वियतनाम, में अपने काम को प्रदर्शित करते समीर

लेकिन समीर को उसके काम की असली पहचान इधर हाल में मिली। भारत और वियतनाम ने एक साथ मिलकर “स्टार्टअप फ्लाइट 2025” नाम की एक पहल शुरू की थी। इसका मक़सद था दोनों देशों के शानदार स्टार्टअप्स को एक दूसरे के सामने लाना। 600 से भी ज़्यादा आवेदन आए थे, और बस 14 स्टार्टअप्स को चुना गया। समीर का “नव कौशल” भी इन 14 चुने गए स्टार्ट अप्स में से एक था।

समीर मिश्रा, वियतनाम के हनोई में, भारतीय स्टार्टअप प्रतिनिधिमंडल के साथ

पहले तो भारत में ही एक तीन दिवसीय ट्रेनिंग सेशन हुआ। “एमिटी इनोवेशन इनक्यूबेटर” ने समीर और दूसरे स्टार्टअप्स को सिखाया कि अपने प्रोजेक्ट को कैसे बिज़नेस मॉडल में बदलें, कैसे सही तरीके से प्रेजेंटेशन दें। समीर के लिए यह नया ही था, क्योंकि उनका काम तो सीधा-सादा था – गांवों में जाकर बच्चों को सिखाना। अब इसे एक सही स्टार्टअप की तरह पेश करना था।

फिर सभी टीमें वियतनाम गईं। वियतजेट एयर ने उनका पूरा सफ़र भी दिखाया। दिसंबर 2025 के शुरुआत में हनोई में “स्टार्टअप फ्लाइट” का फाइनल इवेंट हुआ। और यह इवेंट कहां था? वियतनाम के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय में! एक गांव के लड़के का यह सपना कि एक विदेशी मंत्रालय में अपना काम प्रेजेंट करे, यह सच हो गया।

वहां समीर ने सीधे सीधे अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि कैसे वह सस्ते साधनों से बच्चों को विज्ञान सिखा रहे हैं। उन्होंने उन तीन लड़कियों की कहानी सुनाई जो अब मर्चेंट नेवी में हैं। उन्होंने उस लड़के की कहानी बताई जिसकी बांस की स्ट्रेचर लोगों की जान बचा रही है। कैसे हर देश में, चाहे वह भारत हो या वियतनाम या कोई और, गांवों में बच्चों को सीखने का मौका दिया जा सकता है। उनका आइडिया यह था कि विकासशील देशों के लिए यह एक बेहतरीन तरीका हो सकता है अपने बच्चों को शिक्षित करने का।

समीर को टेकफेस्ट 2025 वियतनाम के स्टार्टअप फ्लाइट प्रोग्राम में सम्मानित किया गया

और इन सबका सुखद परिणाम क्या निकला? नव कौशल को “एडटेक कैटेगरी” में दूसरा स्थान मिला! और पूरे प्रतियोगिता में यह चौथे स्थान पर रहा। 14 शानदार स्टार्टअप्स की भीड़ में से, एक ग्रामीण प्रोजेक्ट को यह सम्मान मिला। यह सिर्फ एक पुरस्कार नहीं था – यह एक मान्यता थी कि गांवों का काम भी दुनिया के स्तर का हो सकता है। भारतीय दूतावास, वियतनाम, ने भी इस कामयाबी को अपने सोशल मीडिया पर शेयर किया। सोचिए, जो लड़का कुछ साल पहले गांवों में बैठकर पेरिस्कोप बना रहा था, अब एक राजनयिक मंच पर एक राष्ट्र के लिए बोल रहा है। यह समीर के लिए बेहद खास लम्हा था।

लेकिन समीर के लिए यह ट्रिप केवल अवार्ड के बारे में नहीं थी। यह तो एक तरह की पुष्टि थी कि यह काम सार्थक है। गांवों में उन्होंने जो कुछ भी किया है, वह सिर्फ गांवों के लिए ही नहीं, दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। और इसी यात्रा में उन्हें नई संभावनाएं भी दिखीं – नए सहयोग, नई पार्टनरशिप, और शायद नव कौशल को और भी आगे ले जाने का रास्ता।

असली नवाचार कहां से आता है?

समीर की अपनी यात्रा का सोचिए – उड़ीसा के एक छोटे से गांव रुढ़ापदर से शुरू, और अब हनोई के नीति-निर्माण कक्षों तक। यह बताता है कि नवाचार कहीं भी हो सकता है। बड़ी-बड़ी लैब्स की ज़रूरत नहीं। बड़े पैसे की ज़रूरत नहीं। बस एक आइडिया चाहिए, जुनून चाहिए, और बच्चों के लिए स्नेह और समर्पण चाहिए।

समीर ने अपने काम में साबित किया है कि बच्चों को रोज़मर्रा की चीज़ों से विज्ञान सिखाया जा सकता है। प्लास्टिक की बोतलें, कागज़, रस्सी, स्टिक्स – यह सब कुछ हो सकता है एक लैब। बांस, मिट्टी, पत्तियां – सब कुछ काम में आ सकता है। और दिलचस्प बात यह है कि इस तरीके से सीखने वाले बच्चों को शिक्षा ज़्यादा अच्छे से समझ आती है। क्योंकि वह सीधा अपने आस-पास के जीवन से सीख रहे हैं। यह दुनिया के सतत
विकास के लक्ष्यों के साथ भी बिल्कुल मेल खाता है।

अटल टिंकरिंग लैब में आदिवासी छात्राओं को प्रशिक्षण देते हुए समीर

वियतनाम की यात्रा ने समीर की कहानी को एक नया अध्याय दे दिया। अब सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर इस मॉडल को दोहराया जा सकता है। और यह हो सकता है कि और भी कई देश उनके साथ जुड़ें। अगर किसी विकासशील देश के गांवों में बच्चों को इसी तरह से शिक्षा दी जाए, तो क्या सब कुछ बदल सकता है?

समीर के लिए अब आगे का रास्ता क्या है? समीर कहते हैं कि आगे का रास्ता आसान नहीं है। एक ऐसे प्रोजेक्ट को बड़ा करना जो गांवों की मिट्टी से जुड़ा हुआ है और वहीँ इसका असली जड़ है, यह थोडा मुश्किल है। फंडिंग चाहिए, सही साझेदारियां चाहिए, और सबसे ज्यादा बहुत धैर्य चाहिए। लेकिन समीर के पास पिछले साल की जमीन है – 6000 बच्चों के साथ काम किया है, समुदायों के बीच रहकर उन्हें समझा है। यह एक मज़बूत नींव है। और अब वियतनाम की सफ़लता ने दिखा दिया है कि दुनिया ऐसे आइडियाज को स्वीकार करती है।

SBI जिसके समीर Fellow हैं ,उनके द्वारा शेयर किए गए समीर का विजन

सच कहें तो, समीर की कहानी अभी पूरी नहीं हुई। वियतनाम सिर्फ एक पड़ाव था। लेकिन एक महत्वपूर्ण पड़ाव, जहां से उन्हें नई ताकत मिली। यह दिखाता है कि अगर कोई सही काम करता है, सही इरादों से करता है, तो दुनिया भी उसे नोटिस करती है। और सबसे ख़ास बात यह है – वह नोटिस करती है न सिर्फ व्यक्ति को, बल्कि उन हज़ारों बच्चों को भी जिनकी ज़िंदगी बदल चुकी है।

आज के समय में जब भारत और वियतनाम एक दूसरे के साथ तकनीक के क्षेत्र में काम कर रहे हैं, समीर जैसी कहानियां दिखाती है कि एक अच्छा आइडिया कहीं से भी आ सकता है. शहर से, गांव से, कहीं से भी। और अगर हम उन आइडियाज़ को सही प्लेटफॉर्म दें, तो पूरी दुनिया बदल सकती है।

तो यह थी समीर कुमार मिश्रा की कहानी – एक लखनऊ के लड़के की, जिसने गांवों में काम किया, हज़ारों बच्चों का जीवन बदला, और फिर विश्व मंच पर खुद को साबित किया। तीन बेटियां अब समुद्र पार कर रहीं हैं। एक लड़का लोगों की जान बचा रहा है। और हज़ारों और बच्चे हर दिन कुछ नया सीख रहे हैं, कुछ नया बनाने की कोशिश कर रहे हैं। और जैसा कि वह शुरुआत से ही सोच रहे हैं, आज भी उनका लक्ष्य एक ही है – बच्चों को विज्ञान से प्रेम करवाना, उन्हें सीखने के लिए खुश करना, और उनमें वह जुनून जगाना जो दुनिया को बदल सके।

Previous Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

About Us

The Social Sight is an independent, bilingual platform committed to serious writing on society, power, law, economy, culture, science, and civilisation. We publish in-depth articles in both English and Hindi, recognising that meaningful public debate must speak across languages and reach beyond narrow linguistic spheres.

Most Recent Posts

  • All Post
  • Civilisational Issues
  • Culture & Ideas
  • Economy
  • Geopolitics
  • Hindi Language
  • Law and Society
  • Power & Polity
  • Science, Tech & Future
  • Voices
    •   Back
    • Macroeconomy & Policy
    • Agriculture & Rural Economy
    • Industry, Startups & Markets
    • Inequality & Welfare
    •   Back
    • Science & Research
    • Technology & Society
    • AI, Digital Life & Ethics
    • Climate, Environment & Sustainability
    • Future of Humanity
    •   Back
    • Indic Civilisational Thought
    • History, Memory & Narratives
    • Religion, Philosophy & Ethics
    • Colonialism & Postcolonial India
    • Bharat in Global Civilisations
    •   Back
    • Literature & Books
    • Cinema, Art & Aesthetics
    • Language & Linguistics
    • Media, Journalism & Discourse
    • Popular Culture, Critique
    •   Back
    • Constitutional Law
    • Criminal Justice
    • Civil Rights & Liberties
    • Courts & Judiciary
    • Environment & Justice
    • Legal Policy & Reform
    •   Back
    • Opinion
    • Essays
    • Columns
    • Interviews
    • Letters & Responses
    •   Back
    • Global Politics
    • India & the World
    • Conflicts & Diplomacy
    • International Economy
    •   Back
    • Governance & Institutions
    • Electoral Democracy
    • Federalism & States
    • Political Parties & Leadership

Category

© 2026 The Social Sight. All Rights Reserved.