विपक्षी दल चीख-चीख कर वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा यदि अब भी लगाते रहे और बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी हार की असली वजह से मुंह चुराते रहे तो भविष्य में उनका अस्तित्व खतरे में पड़ना तय है। दर असल बीते वर्ष नवम्बर में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में अपनी जबरदस्त हार पर विपक्ष आत्मचिंतन नहीं करना चाहता। वह तो पहाड़ जैसी अपनी गलतियों और गुनाहों को तिनके के पीछे छिपाना चाहता है। तिनके के पीछे पहाड़ कभी छिप नहीं सकता। इसके बावजूद विपक्षी दल आत्ममंथन करने की जगह अब भी तिनके के पीछे पहाड़ छिपाने का विफल प्रयास कर रहे हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि केन्द्र और बिहार में सत्ता पर काबिज राजग सरकार ने चुनाव में बड़े पैमाने पर वोट चोरी की। विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव में ईवीएम के माध्यम से गड़बड़ी की गई और चुनाव आयोग ने मतदाता सूची गहन पुनरीक्षण (एस आई आर) कराकर लाखों की संख्या में मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए । विपक्ष का मानना है कि बिहार की महिलाओं को चुनाव की घोषणा से ठीक पहले सरकार की ओर दस- दस हजार रुपए की रिश्वत दी गई जिसके कारण विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को पराजय का मुंह देखना पड़ा। मतलब यह कि यहां के विपक्षी दल चुनाव में हुई हार का न तो विश्लेषण करना चाहते और न ही आत्ममंथन। विपक्षी दलों का यदि यही रवैया रहा तो भविष्य में होने वाले चुनावों में भी उनका सूपड़ा साफ होना ही होना है। 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा के हालिया चुनाव में भाजपा को 89, जदयू को 85 और राजद को सिर्फ 25 सीटें मिलीं। कांग्रेस को केवल छह , असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी ए आई एम आई एम को पांच , जीतन राम मांझी की पार्टी हम को पांच , लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को 19 और अन्य को 09 सीटें मिली थीं। इस चुनाव में राजद और कांग्रेस को जबरदस्त झटका लगा। राजद 75 सीट से घटकर 25 पर सिमट गई। उसे पिछले चुनाव में इतनी सीटें नीतीश कुमार के साथ चुनाव लड़ने के कारण मिली थीं। उस समय नीतीश भाजपा से अलग और राजद के साथ थे।इस बार कांग्रेस को भी सीटों का भारी नुकसान हुआ । उसे 2020 के विधानसभा चुनाव में 19 सीटों पर विजय मिली थी मगर इस बार के चुनाव में उसे 13 सीटों का जबरदस्त नुकसान हुआ।
जहां तक वोट चोरी और ईवीएम में गड़बड़ी का मामला है , विपक्षी दलों की इस शिकायत में कोई दम नहीं। न तो ईवीएम में कोई गड़बड़ी है और न चुनाव आयोग किसी तरह का पक्षपात करता है। लोकसभा के लिए 2024 में करायें गये चुनाव की निष्पक्षता पर जनता की राय जानने के लिए कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने कुछ महीने पहले सर्वे कराया था। कर्नाटक सरकार ने अभी – अभी उसकी रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार सर्वे में 91 प्रतिशत लोगों ने 2024 के लोकसभा चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष बताया। इतना ही नहीं मतदाताओं ने ईवीएम पर भी पूरा भरोसा जताया। यह सर्वेक्षण कर्नाटक के योजना और सांख्यिकी विभाग ने किया था। सर्वक्षण की यह रिपोर्ट पिछले साल अगस्त में सरकार को सौंपी गई जिसे कर्नाटक निगरानी एवं मूल्यांकन प्राधिकरण ने इस वर्ष पहली जनवरी को प्रकाशित की है। कांग्रेस नीत सभी विपक्षी दल पिछले डेढ़ साल से चुनाव में वोट चोरी का मुद्दा उठा रहे हैं और ईवीएम पर सवाल खड़े कर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं। विपक्षी दल ईवीएम से चुनाव कराने का विरोध और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लगातार निम्न स्तरीय हमले कर रहे हैं। जाहिर है कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की इस सर्वेक्षण रिपोर्ट से विपक्षी दलों का वोट चोरी का मुद्दा और ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत निराधार साबित हो गई।
अब रही बिहार में महिलाओं को चुनाव से पहले दस-दस हजार रुपए रिश्वत देने की बात। तो विपक्षी दलों की इस शिकायत में भी कोई दम नहीं नजर आता।
तथ्य इसके विपरीत हैं। बिहार में लोक सभा की कुल 40 सीटें हैं। 2024 के चुनाव में राजग ने इन में से 30 सीटों पर विजय हासिल की। तब तो सरकार की यहां कोई 10 हजारी योजना नहीं थी। फिर भी चुनाव में विपक्षी दल चारों खाने चित हो गये। नवम्बर 2024 में बिहार विधान सभा की 4 सीटों पर उप चुनाव हुए थे। इनमें से तीन सीटें पहले इंडी गठबंधन यानी महागठबंधन के पास थीं। 2020 के आम चुनाव में वहां उनकी विजय हुई थी। मगर नवम्बर 2024 इन सीटों पर उप चुनाव हुए तो चारों सीटों पर राजग जीत गया । यानी, राजग ने महागठबंधन से एक दो नहीं, बल्कि तीन सीटें छीन लीं। तीन में से 2 सीटें राजद के पास और एक सीट माले के पास थी। उस समय यह माना जाता था कि राजद और माले से सीटें छीनना कठिन काम है। विपक्षी दलों को यह हार तब झेलनी पड़ी थी जब महिलाओं के लिए बिहार में दस हजार रुपए देने की कोई योजना नहीं थी। जाहिर है बिहार के लोग राज्य की नीतीश कुमार सरकार के कामों से संतुष्ट हैं तभी तो विपक्षी दलों को चुनावों में लगातार हार का मुंह देखना पड़ा रहा है।
हकीकत यह है कि इस देश की तथाकथित सेक्युलर पार्टियां (विपक्ष), पिछले डेढ़ दशक में राज्य के गांव – गांव में हुए विकास कार्यों की अनदेखी कर सिर्फ वोट चोरी का ढोल पीट रही हैं। पंद्रह -बीस वर्षों में नीतीश कुमार की सरकार ने गांवों में सड़कों का जाल बिछा दिया है। गांव- गांव चौबीसों घंटे बिजली है और लोगों को नलों से पेयजल मिल रहा है। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने ग्यारह वर्ष के शासन में बिहार के गरीबों की जिंदगी बदल दी । केन्द्र सरकार की सहायता से अब गांवों में बेघरों के पास अपना घर और शौचालय है । उज्ज्वला योजना के तहत सबके पास रसोई गैस का कनेक्शन है। बैंकों में सबके अकाउंट हैं जिनमें सरकार की ओर से सहायता राशि सीधे पहुंच रही है। कोई बिचौलिया नहीं। पहले ये बिचौलिए गरीबों की सहायता राशि का अधिकांश हिस्सा हड़प जाते थे। और तो और , हर गरीब परिवार को सरकार की तरफ से मुफ्त में अनाज मिल रहा है। किसानों को खेती के लिए हर साल छह हजार रुपए मिल रहे हैं और बुजुर्गों को वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार ने यह पेंशन चार सौ रुपए से बढ़ाकर ग्यारह सौ रुपए कर दी। नीतीश सरकार ने अपने शासनकाल में बालिकाओं की शिक्षा के लिए मुफ्त साइकिल और स्कूली पोशाक वितरण योजना लागू की जिसका उन पर सकारात्मक असर हुआ। इससे हुआ यह कि गांव-गांव की बालिकाएं पढ़ने के लिए अब स्कूल जाती हैं। महिलाओं के स्वावलंबन के लिए नीतीश सरकार वर्षों से जीविका योजना के तहत उन्हें आर्थिक सहायता दे रही है। विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले जीविका दीदियों को मुख्यमंत्री नीतीश ने कोई रिश्वत नहीं बल्कि रोजगार के लिए उन्हें दस हजार रुपए की वित्तीय सहायता दी। इनके अलावा राज्य सरकार बिहार में वर्षों से कई और कल्याणकारी योजनाएं चला रही है। राज्य सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दें रही है। शराबबंदी के कारण राज्य की विधि व्यवस्था भी सुधरी है और महिलाओं की घरों में प्रताड़ना में भी इसके कारण कमी आई है। लालू यादव की पार्टी राजद राज्य में मुख्य विपक्षी दल है। बिहार में पंद्रह साल तक इसकी सरकार रही। राजद का यह राज जंगल राज के नाम से कुख्यात है जिसे लोग अब भी भूल नहीं पाते। नीतीश कुमार के शासन में इस जंगल राज से बिहार के लोगों को मुक्ति मिली। हकीकत यह है कि राजद नेताओं का रवैया अब भी बदला नहीं है जिससे यहां के लोगों को लगता है कि राजद की जीत से राज्य में कहीं फिर न जंगल राज की वापसी हो जाये। ये कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण तथ्य हैं जिनकी वजह से इस बार विधानसभा चुनाव में राजद और उसके सहयोगी दलों का सूपड़ा साफ हो गया।
बिहार ही नहीं बल्कि लगभग पूरे देश के राजनीतिक परिदृश्य पर गौर करने पर ऐसा लगता है कि देश की जनता के सामने इस समय राजग को वोट देने के सिवा कोई विकल्प नहीं। मजबूत लोकतंत्र में मजबूत विपक्षी का होना जरूरी है। मगर सत्ता से च्युत यहां के विपक्षी दल जनता का भरोसा खो चुके हैं और वे लगातार हाशिये पर सिमटते जा रहे हैं। दर असल विपक्षी दल सरकार का विरोध करते – करते लगातार देश का विरोध करने लगे हैं। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है मगर केन्द्र की सत्ता से वह पिछले ग्यारह वर्षों से बाहर है। राज्यों में भी उसका जनाधार लगभग समाप्त सा है। इस समय केवल दो राज्यों में उसकी सरकारें हैं। इससे हताश कांग्रेस के नेता राहुल गांधी निरंतर देश विरोधी वक्तव्य देते रहते हैं। राहुल एक ओर तो हाथ में संविधान की किताब लेकर इसकी रक्षा की बात करते हैं मगर दूसरी ओर वे यह खुला एलान करते हैं कि उनकी लड़ाई सरकार से नहीं, उनकी लड़ाई तो इंडियन एस्टैब्लिशमेंट से है। इंडियन एस्टैब्लिशमेंट से तो पाकिस्तान जैसे दुश्मन देश लड़ रहे हैं । राहुल के इस बयान से यह लगता है कि वे और उनकी पार्टी भारत के दुश्मन देशों के साथ है। कांग्रेस रह-रह कर भारतीय सेना पर हमले करती है। उसके नेता सेना के पराक्रम पर उसकी प्रशंसा करने की बजाय उससे सबूत मांगते हैं। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर हमले करते हैं। दुश्मन देश चीन के साथ कांग्रेस और राहुल गांधी की नजदीकियां उजागर हो चुकी हैं। राहुल भारत को राष्ट्र नहीं बल्कि राज्यों का संघ बताते हैं। सत्ता में बने रहने के लिए कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक अर्थ हिन्दू और सनातन विरोध है। मुस्लिम परस्ती इन दलों की अहम नीति है जबकि मुस्लमान यहां की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं । जब- जब और जहां – जहां कांग्रेस की सरकारें रहीं तब-तब वहां हिन्दुओं के साथ खुलकर भेदभाव किया गया। कांग्रेस की सहयोगी राजद और समाजवादी पार्टी तो एम वाई ( मुस्लिम – यादव) समीकरण पर खुलकर चुनाव लड़ती है। कांग्रेस की सहयोगी तमिलनाडु की डीएमके खुलेआम सनातन उन्मूलन अभियान चला रही है और हिन्दू धर्म को डेंगू- मलेरिया बता रही है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार वर्षों से घुसपैठियों को किस तरह संरक्षण दे रही है यह पूरा देश जान चुका है। भगवान राम के नाम से ममता किस तरह बिदकती हैं और वहां हिन्दुओं को दोयम दर्जा देती हैं यह किसी से छिपा नहीं।देश के लोग विपक्षी दलों की इस हिन्दू विरोधी राजनीति को अब समझ चुके हैं। इस तरह विपक्षी दलों की खामियों और गुनाहों का यह इतना बड़ा पहाड़ है जो तिनके से छिपाये नहीं छिप सकता। बिहार की जनता दरअसल राज्य की राजग सरकार के कार्यों से बहुत संतुष्ट है। बिहार विधानसभा का संभवतः यह पहला ऐसा चुनाव था जिसमें जनता नीतीश के नेतृत्व वाली राजग सरकार से इस कदर खुश थी जैसा पहले कभी देखने में नहीं आया। गांव – गांव की जनता जब यह कहे कि सरकार ने हमें सबकुछ दे दिया , अब हमें और कुछ नहीं चाहिए तब समझिए सरकार के पक्ष में चुनावी सुनामी आई हुई है। बिहार विधानसभा के हालिया चुनाव में ऐसी ही सुनामी थी जिसमें विपक्षी दलों का सूपड़ा साफ हो गया।
द्वारा: अनिल विभाकर.


