“जब तक भारतवर्ष की महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर धार्मिक, राजनीतिक एवं सांसारिक मामलों में बराबरी से अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं करती हैं, तब तक भारतवर्ष के भाग्य का उदय नहीं हो सकता है।” – महात्मा गाँधी
महिलाओं में हर स्तर पर आत्मविश्वास पैदा करके उसे सशक्त बनाने की प्रक्रिया का नाम ही है, महिला सशक्तीकरण। हालाँकि सनातन परम्परा में महिलाएँ हर तरह से सशक्त थीं। वैदिक काल से ही स्त्रियों को समाज में सम्मान जनक स्थान प्राप्त था। पर धीरे-धीरे महिलाओं का क्षेत्र संकुचित होता चला गया। यहाँ तक कि उन्हें, उनकी शिक्षा से भी वंचित कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि एक-एककर उनसे उनके सारे अधिकार उनकी शिक्षा के अभाव में तिरोहित होते चले गयें या फिर उनके अधिकार काफ़ी कम कर दिए गयें।
नारी के बारे में कहा जाता है कि जिसका कोई अरि नहीं है, वही नारी है। कालान्तर में उसी नारी को अशिक्षा, नैतिकता के बदलते मानदंडों एवं एकांगी आदर्श के बोझ तले ऐसा दबाया गया कि वह खुलकर न जी सकती थी, न मर सकती थी। दूसरे शब्दों में कहें तो वह द्वितीय श्रेणी की नागरिक बन कर रह गयी थी। पर महिलाओं की यह स्थिति भी चिर स्थाई नहीं रही। समय के साथ इस सोच में भी परिवर्तन आया। इसके लिए समय-समय पर स्वयं महिलाओं द्वारा संघर्ष भी किया गया, और साथ ही कुछ प्रबुद्ध पुरुषों का भी महिलाओं को साथ मिला। कुछ लोगों को इस बात का एहसास था कि किसी भी देश या समाज के लिए महिलाओं का उतना ही महत्त्व है, जितना पुरुषों का। महिलाओं को अलग करके किसी देश या समाज की तरक्की हो ही नहीं सकती।
प्राचीन काल से लेकर अर्वाचीन काल तक महिलाओं ने अपने परिश्रम एवं कौशल के बल पर समाज की प्रगति में अपनी अहम् भूमिका निभाई है। पर पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के प्रति जागरूक समाज महिलाओं के तरफ ठीक से देख ही नहीं पाता था, अपनी आँखें बंद कर लेता था। इसका परिणाम यह हुआ कि हमारे समाज द्वारा महिलाओं का सही मूल्यांकन हो नहीं पाया, और उसकी दक्षता को हमेशा कमतर करके ही आँका गया। इसलिए ऐसे लोगों के विचारों को परिवर्तित करने के लिए भी भारतीय समाज में महिला सशक्तिकरण आवश्यक हो गया, ताकि महिलाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर अवसर प्राप्त कर सकें। अपने जीवन का निर्णय वह स्वयं ले सकें। समाज में व्याप्त लैंगिक भेदभाव को खत्म किया जा सके तथा अपने समाज और राष्ट्र के विकास में पूरी क्षमता से महिलाएँ अपना योगदान दे सकें। जिससे एक न्यायपूर्ण और समृद्ध समाज का निर्माण हो सके। भारत के संदर्भ में यह और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि 2047 तक भारतवर्ष को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में शामिल कराने की देशवासियों की आकांक्षा है, और महिलाएँ किसी भी देश की आधी आबादी होती हैं। ऐसे में अपनी आधी आबादी को पीछे छोड़ कर कोई भी देश विकसित राष्ट्र बनने की कल्पना भी नहीं कर सकता।
महिला सशक्तीकरण सभी स्तर पर महिलाओं में आत्मविश्वास पैदा करके उसे सशक्त बनाने की एक प्रक्रिया है। महिला सशक्तीकरण बुनियादी तौर पर मानवाधिकार ही है, जो एक शांत और समृद्ध विश्व के निर्माण के लिए आवश्यक है। एक सशक्त महिला परिवार, समाज और देश के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।
महिला सशक्तीकरण का अर्थ केवल भौतिक या आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, अपितु शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से भी महिलाओं को सक्षम बनाना है, ताकि वे अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सकें। महिलाएँ भी समाज में पुरुषों के समान ही अधिकार और अवसर प्रदान कर सकें; जिसमें शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य और राजनीतिक भागीदारी भी शामिल है। यह प्रक्रिया महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाती है, और लैंगिक भेदभाव को चुनौती भी देती है, ताकि महिलाएँ समाज के विकास में पूरी तरह से योगदान कर सकें।
महिला सशक्तीकरण महिलाओं को ज्ञान, कौशल और संसाधनों से परिपूर्ण करती है, जिससे वे सोच-समझकर कर कोई निर्णय ले सकें और राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में अपनी भागीदारी दे सकें।
हमारी सरकारें महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक बाधाओं को पार करने और उनमें आत्मनिर्भरता विकसित करने में उनकी मदद के लिए तथा समाज में पुरुषों के समान स्थान पाने के लिए महिलाओं के लिए तरह-तरह की योजनाएँ चला रही हैं, ताकि जिससे एक ओर लिंग अनुपात में सुधार लाया जा सके, तो दूसरी ओर महिलाओं को समाज में वांछित सम्मान मिल सके। ये योजनाएँ निम्नलिखित हैं-
शिक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी योजनाएँ-
1- बालिकाओं के लिंग अनुपात में सुधार और शिक्षा में सुधार के लिए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (BBBP)नाम की योजना सरकार द्वारा शुरू की गयी है।
2- बालिकाओं के भविष्य के लिए एक बचत योजना सुकन्या समृद्धि योजना ( SSY) के नाम से चलाई गई है।
3- गर्भवती महिलाएँ एवं स्तनपान कराने वाली माताओं को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) के नाम से शुरू की गई।
4- महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण सेवाओं को मजबूत करने के लिए स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार अभियान चलाया जा रहा है।
आर्थिक सशक्तीकरण सम्बन्धी योजनाएँ-
1- सुरक्षा और सशक्तीकरण के माध्यम से महिलाओं को सहायता प्रदान करने के लिए मिशन शक्ति योजना चलाई जा रही है।
2- महिला उद्यमियों को बिना कोलैटरल के कम ब्याज पर लोन उपलब्ध कराने के लिए -प्रधानमंत्री मुद्रा योजना चलाई जा रही है।
3- महिलाओं को प्रशिक्षण, ॠण विकास और परामर्श के माध्यम से सशक्त बनाने के लिए TRED योजना चलाई जा रही है।
4- महिलाओं के व्यवसाय बढ़ाने के लिए व्यक्तिगत ऋण हेतु स्त्री शक्ति नामक एक योजना चलाई जा रही है।
5- रोजगार के लिए वित्तीय सहायता के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना चलाई जा रही है।
सामाजिक सुरक्षा और कल्याण के लिए
1- महिलाओं के संबल के लिए मिशन शक्ति के अन्तर्गत वन स्टाॅप सेंटर, महिला हेल्पलाइन और नारी अदालत जैसी सेवाएँ चलाई जा रही हैं।
2- कामकाजी महिलाओं के लिए सुरक्षित छात्रावास वर्किंग वुमेन हॉस्टल (WWH)चलाया जा रहा है।
3- विधवाओं की आर्थिक मदद के लिए विधवा पेंशन योजना के अन्तर्गत आर्थिक मदद दी जा रही है।
इसके अतिरिक्त महिलाओं की सुविधा एवं मदद के लिए अन्य महत्त्वपूर्ण योजनाएँ-
1- रसोई गैस कनेक्शन उपलब्ध कराना।
2- नारी शक्ति वंदन अधिनियम: महिलाओं के लिए राजनीतिक सशक्तीकरण।
3- नमो ड्रोन दीदी योजना(SHGS) द्वारा महिला स्वयं सहायता समूह को ड्रोन तकनीक से सशक्त बनाना, जिससे वे अपने ड्रोन को बीज,खाद आदि छिड़काव के लिए
किसानों को किराये पर दे अपनी आमदनी बढ़ा सकें।
4- लखपति दीदी योजना के तहत (SHCS) महिलाओं को आर्थिक मजबूती देना।
5- प्रधानमंत्री आवास योजना के अन्तर्गत कमज़ोर वर्गों-SC/ST/OBC और विकलांग को प्राथमिकता देने वाली इस योजना के अन्तर्गत महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिलने वाला आवास का मालिकाना हक़ मुख्य रूप से घर की महिला सदस्य को सरकार द्वारा दिया जाता है। हालाँकि परिस्थिति वश कभी संयुक्त नाम पर भी आवास का मालिकाना हक़ दिया जाता है। महिला के नहीं रहने पर ही केवल पुरुष के नाम पर आवास का मालिकाना हक़ सरकार द्वारा दिया जाता है।
इन सरकारी योजनाओं का महिला सशक्तीकरण पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ रहा है। आज देश के हर क्षेत्र में महिलाएँ पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करती हुई दीख जाती हैं। एक ओर जहाँ हवाई जहाज उड़ाने से लेकर ऑटो रिक्शा चलाते हुए महिलाएँ दिखाई दे जाती हैं, तो वहीं दूसरी ओर देश की सरहदों की कड़ाके की ठंड में निगरानी करती हुई या फिर ट्रेफ़िक कंट्रोल करती हुई भी महिलाएँ बहुत आसानी से देखीं जा सकती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि आज महिलाएँ जीवन के हर क्षेत्र में अपनी सेवाएँ दे रही हैं, और साथ ही अपनी एक अलग पहचान भी बना रही हैं।
द्वारा: डॉक्टर ज्योत्स्ना प्रसाद


